December 26, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -008 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ आठवाँ अध्याय शरीर में स्थित योगस्थानों (चक्रों) का वर्णन, योग का स्वरूप, अष्टांगयोग का वर्णन, विषयभोगों की निस्सारता, प्राणायाम की महिमा, सदाशिव के ध्यान का स्वरूप श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अष्टमोऽध्यायः अष्टाङ्ग योग निरूपणं सूतजी बोले — हे द्विजो ! अब मैं भगवान् शंकर के द्वारा जगत् के हितार्थ कल्पित किये गये योगस्थानों का संक्षेप में वर्णन करूँगा ॥ १ ॥ गले से नीचे तथा नाभि से ऊपर का वितस्ति (बारह अँगुल) परिमाणवाला [हृत्कमल नामक ] स्थान योग के लिये उत्तम स्थान है। इसी प्रकार नाभि से नीचे मूलाधार नामक तथा दोनों भृकुटियों के मध्य में आवर्त [ आज्ञाचक्र ] नामक स्थान भी योगस्थान है ॥ २ ॥ जीव को परमार्थ तत्त्व का ज्ञान प्राप्त होना ही योग कहा जाता है और चित्त की एकाग्रता सर्वदा उन्हीं शिव के अनुग्रह से होती है ॥ ३ ॥ हे श्रेष्ठ द्विजो ! उस अनुग्रह का स्वरूप स्वसंवेद्य है अर्थात् स्वानुभूति का विषय है । ब्रह्मा आदि भी उस स्वरूप का वर्णन नहीं कर सकते। मनुष्य धीरे-धीरे उस स्वरूप को योग के माध्यम से जान लेता है ॥ ४ ॥ योगसाधना से प्राप्त निर्वाण माहेश्वर पद कहा जाता है। उस निर्वाण का हेतु रुद्र का ज्ञान हो जाना ही है और वह ज्ञान उन्हीं की कृपा से होता है ॥ ५ ॥ जो सभी इन्द्रियों को नियन्त्रित करके उस ज्ञान से पापों को जला डालता है, इन्द्रियों की वृत्तियों पर नियन्त्रण रखने वाले उस प्राणी को योग की सिद्धि अवश्य होती है ॥ ६ ॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! चित्त की वृत्तियों पर नियन्त्रण करना ही योग है । सिद्धि-प्राप्ति के लिये इस योग के आठ प्रकार के साधन यहाँ बताये गये हैं ॥ ७ ॥ पहला साधन यम, दूसरा नियम, तीसरा आसन, चौथा प्राणायाम, पाँचवाँ प्रत्याहार, छठाँ धारणा, सातवाँ ध्यान तथा आठवाँ साधन समाधि कहा गया है ॥ ८-९ ॥ तप में प्रवृत्ति तथा विषय-भोगों से निवृत्ति को यम कहते हैं। यम की साधना करने वालों में श्रेष्ठ हे मुनियो ! यम का प्रथम हेतु अहिंसा है । पुनः सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह भी यम के आधार हैं। नियम का भी मूल यही यम है; इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ १०-११ ॥ सभी प्राणियों में आत्मवत् दृष्टि रखकर उनके हित के लिये प्रवृत्त रहने को अहिंसा कहा गया है। अहिंसा से आत्मज्ञान की सिद्धि प्राप्त होती है ॥ १२ ॥ जैसा देखा गया हो, सुना गया हो, अनुमान किया गया हो तथा स्वयं अनुभव किया गया हो — उसे ठीक उसी तरह से दूसरों को कष्ट न पहुँचाते हुए कह देना ही ‘सत्य’ कहा जाता है ॥ १३ ॥ ब्राह्मण तथा वेद ऐसा कहते हैं कि अश्लील बातें नहीं करनी चाहिये और दूसरों के दोष जानकर भी उसे अन्य व्यक्ति से नहीं कहना चाहिये ॥ १४ ॥ विपत्तिकाल में भी विचारपूर्वक मन, वचन तथा कर्म से दूसरों का द्रव्य न लेना ही संक्षेप में अस्तेय (चोरी न करना) कहा जाता है ॥ १५ ॥ यतियों, ब्रह्मचारियों तथा विशेष रूप से पत्नीरहित संन्यासियों के द्वारा मन, वचन तथा कर्म से मैथुन में प्रवृत्ति न रखना — उनके लिये ब्रह्मचर्य कहा गया है । पत्नीयुक्त गृहस्थों के (ब्रह्मचर्य के) विषय में मैं अब आप लोगों को बताता हूँ। मन, वाणी तथा कर्म से परनारी में सदा भोग की प्रवृत्ति न रखते हुए अपनी पत्नी के साथ उचित समय पर प्रसंग करना ब्रह्मचर्य कहा गया है ॥ १६–१८ ॥ यद्यपि अपनी स्त्री भोगकाल में पवित्र होती है, फिर भी उसके साथ संभोग के अनन्तर स्नान कर लेना चाहिये। ऐसा करने वाला पवित्रात्मा गृहस्थ निःसंदेह ब्रह्मचारी ही कहा जाता है ॥ १९ ॥ [जैसे शास्त्रविहित स्वदारा प्रवृत्त गृहस्थ ब्रह्मचारी ही है, ठीक वैसे ही] द्विज, गुरु, अग्नि (यज्ञ), पूजन के निमित्त शास्त्रविहित की गयी हिंसा भी अहिंसा ही मानी जाती है ॥ २० ॥ स्त्रियों का सदैव त्याग करना चाहिये। उनके सान्निध्य से बचना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष को स्त्रियों में वही वृत्ति रखनी चाहिये, जैसी चित्तवृत्ति शव में रखी जाती है ॥ २१ ॥ जमीन पर मल तथा मूत्र के त्याग के समय जैसी मनः स्थिति होती है, वैसी ही मनोदशा अपनी पत्नी के साथ संभोगकाल में बनानी चाहिये, फिर अन्य की तो बात ही क्या ! ॥ २२ ॥ स्त्री प्रज्वलित अंगार के समान तथा पुरुष घी के घड़े के समान होता है, अतएव दूर से ही नारियों का संसर्ग छोड़ देना चाहिये ॥ २३ ॥ विषयों के भोग से इन्द्रियों की तृप्ति नहीं होती, अतएव विचारपूर्वक मन, वाणी तथा कर्म से भोगों के प्रति विरक्ति का भाव रखना चाहिये ॥ २४ ॥ विषयों के उपभोग से कामनाओं की शान्ति कभी भी नहीं होती है। यह कामना आहुति डालने पर अग्नि की भाँति पुनः बढ़ती ही जाती है ॥ २५ ॥ अतः योगी को अमृतत्व – प्राप्ति के निमित्त भोगों का सदा के लिये त्याग कर देना चाहिये, क्योंकि मनुष्य वैराग्य वृत्ति न रखने के कारण अनेक योनियों में जन्म लेता रहता है ॥ २६ ॥ श्रुतियों तथा स्मृतियों के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ हे मुनीश्वरो ! त्याग से ही अमृतत्व की प्राप्ति सम्भव है। कर्म से, सन्तान से तथा द्रव्य आदि किसी भी साधन से अमृतत्व की प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ २७ ॥ इसीलिये सद्गृहस्थ प्राणी को चाहिये कि वह मनसा, वाचा, कर्मणा विषयों से राग-निवृत्ति करें; क्योंकि ऋतुकाल को छोड़कर समागम की अनाकांक्षा को भी ब्रह्मचर्य कहा गया है ॥ २८ ॥ [हे मुनियो ! ] मैंने संक्षेप में यमों के विषय में बता दिया और अब आप लोगों से नियमों का वर्णन करता हूँ । शौच, यज्ञ, तप, दान, स्वाध्याय, इन्द्रियनिग्रह, व्रत, उपवास, मौन तथा स्नान — ये दस प्रकार के नियम हैं ॥ २९१/२ ॥ आकांक्षाराहित्य, शुचिता, सन्तुष्टि, तप, जप एवं भगवान् शिव से सम्बन्ध स्थापित करना तथा पद्मासन आदि — ये नियम हैं ॥ ३०१/२ ॥ शुचिता बाह्य तथा आभ्यन्तर- भेद से दो प्रकार की कही गयी है, उसमें भी आन्तरिक शुचिता श्रेष्ठ है। साधक को बाह्य पवित्रता से युक्त होकर आन्तरिक पवित्रता के लिये प्रयास करना चाहिये ॥ ३११/२ ॥ शिवपूजकों को चाहिये कि वे विधिपूर्वक भस्मस्नान, जलस्नान तथा मन्त्रस्नान सम्पन्न करने के पश्चात् आभ्यन्तर शुचिता का सम्पादन करें; क्योंकि सम्पूर्ण शरीर में पवित्र मृत्तिका का लेपन करके सर्वदा पवित्र तीर्थ के जल में अवगाहन करने वाला भी अन्त: शौच के बिना मलिन ही रहता है ॥ ३२-३३१/२ ॥ हे द्विजोत्तमो ! सदा जल में रहने पर भी शैवाल, झषक (मगरमच्छ), मत्स्य और मत्स्यजीवी ( मछुआरे ) क्या कभी पवित्र हुए हैं ? इसीलिये सदा विधिपूर्वक आन्तरिक पवित्रता का सम्पादन करना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥ शरीर पर एक बार श्रद्धापूर्वक वैराग्यरूपी मृत्तिका का लेपन करके आत्म-ज्ञानरूपी जल में स्नान करके शुद्ध हो जाने को अन्तःशौच कहा गया है। शुद्ध पुरुष को ही सिद्धियाँ मिलती हैं, अशुद्ध पुरुष को कभी नहीं मिलतीं ॥ ३६१/२ ॥ जो व्रती पुरुष न्यायपूर्वक अर्जित किये गये धन से संतुष्ट रहता है और गये धन के विषय में चिन्तन नहीं करता, वह सन्तोषी कहा जाता है। चान्द्रायण आदि व्रतों का निपुणतापूर्वक आचरण करना शुभ तप कहा गया है ॥ ३७-३८ ॥ प्रणव का जप स्वाध्याय कहा जाता है और वह जप तीन प्रकार का कहा गया है। वाचिक जप अधम, उपांशु (मन्द स्वरात्मक) जप मुख्य (उत्तम) तथा मानस जप उत्तमोत्तम है, जो पंचाक्षर कल्प में विस्तार से बताये गये हैं। इस प्रकार मन, वचन तथा शारीरिक क्रियाओं से शिव का प्रणीधान और गुरु के प्रति निश्चल तथा प्रतिष्ठित भक्ति को शिव ज्ञान कहा गया है। विषयों में आसक्त इन्द्रियों को शीघ्र ही उनसे हटाकर इन्द्रियों पर नियन्त्रण करने को संक्षेप में प्रत्याहार कहा गया है और हृदय आदि स्थानों में चित्त को रोकने की क्रिया संक्षेप में धारणा कही गयी है ॥ ३९-४२ ॥ स्वस्थचित्तता से उसी धारणा की स्थिरता ही ध्यान है, जो विचारणापूर्वक समाधि में परिणत हो जाता है। ध्येय विषय में चित्त की एकाग्रता ही ध्यान है और इस स्थिति में चित्त अन्य वृत्तियों से रहित हो जाता है ॥ ४३ ॥ चैतन्यस्वरूप ध्येय मात्र से भासित होने वाला और इस प्रकार देहशून्यता की स्थिति को प्राप्त वह ध्यान ही समाधि है और प्राणायाम को इन समस्त ध्यान-समाधि आदि का हेतु कहा गया है ॥ ४४ ॥ अपने शरीर से जायमान वायु ही प्राण है और उसे रोकने को यम कहते हैं। द्विजों ने मन्द, मध्य तथा उत्तम — ये तीन प्रकार के यम बतलाये हैं ॥ ४५ ॥ प्राण और अपान वायु का निरोध ही प्राणायाम कहलाता है । मन्द प्राणायाम का मान बारह मात्राओं का कहा गया है। बारह लघु अक्षरों के उच्चारणकाल तक प्राणवायु को रोकना मन्द प्राणायाम या द्वादशमात्रात्मक प्राणायाम बताया गया है। उसके दुगुने उच्चारणकाल अर्थात् चौबीस मात्राओं के समयतक प्राणवायु के निरोधन को मध्यम प्राणायाम कहते हैं। इसी प्रकार तीन गुने उच्चारणकाल अर्थात् छत्तीस मात्राओं के उच्चारणकालत क प्राणवायु को रोकने को उत्तम प्राणायाम कहा जाता है । मन्द, मध्य तथा उत्तम प्राणायाम शरीर में क्रमशः प्रस्वेद ( पसीना ), कम्पन तथा उत्थान ( ऊपर उठने की क्रिया) उत्पन्न करनेवाले हैं ॥ ४६-४८ ॥ आनन्द की उत्पत्ति करने वाले योग की प्राप्ति के लिये किये जाने वाले प्राणायाम से निद्रा, घूर्णन, रोमांच तथा ध्वनि से व्याप्त कम्पन शरीर के अंगों में उत्पन्न हो जाता है ॥ ४९ ॥ जब निरन्तर प्राणायाम के अभ्यास से [ उत्पन्न स्वेदबिन्दु [पसीना ] झलकने लगे, संविन्मूर्च्छा – ज्ञानमयी उन्मनी अवस्था आने लगे, सहसा उष्णतावश ] शरीर हलका होकर प्लवन [जल में तैरने जैसी स्थिति] — जैसी अवस्था का अनुभव करे, तब इस सुशोभन अवस्था को उत्तमोत्तम प्राणायाम कहा गया है ॥ ५० ॥ सगर्भ तथा अगर्भ — यह दो प्रकार का होता है । जपसहित प्राणायाम सगर्भ तथा जपरहित प्राणायाम अगर्भ कहा जाता है। हाथी, शरभ [^1] तथा सिंह अत्यन्त दुराधर्ष होते हैं। जैसे उन्हें पकड़कर उनका दमन किये जाने पर वे अस्वस्थ हो जाते हैं, उसी प्रकार यह दुराधर्ष प्राणवायु भी योगियों के द्वारा वश में किये जाने पर अस्वस्थ हो उठता है अर्थात् अव्यवस्थित हो जाता है ॥ ५१-५२ ॥ नियमपूर्वक अभ्यास किये जाने पर वह वायु उसी प्रकार स्वस्थता को प्राप्त हो जाता है, जैसे मतवाले सिंह, जाने पर अपने अधीन हो जाते हैं ॥ ५३ ॥ हाथी तथा शरभ अभ्यासपूर्वक युक्ति से दमित किये जाने पर अपने अधीन हो जाते हैं ॥ ५३ ॥ जैसे नियमतः नियन्त्रण करने पर शनैः-शनैः अपनी उग्रता को त्यागकर ये सिंहादि आदरपूर्वक वश में हो जाते हैं, वैसे ही यह प्राणवायु भी शनैः-शनैः अभ्यास से अपनी अस्वस्थता को छोड़कर समत्वभाव को प्राप्त हो जाता है ॥ ५४ ॥ जो पुरुष योगपूर्वक अभ्यास करता है, उसके चित्त में व्यसन उत्पन्न नहीं होता है। इस प्रकार सततं अभ्यास करने पर प्राणायाम से उस योगी के मन-वचन तथा कर्म से जायमान सभी दोष नष्ट हो जाते हैं और इस प्राणायाम से इसे करने वाले उस बुद्धिमान् योगी के देह की भलीभाँति रक्षा भी होती है ॥ ५५-५६ ॥ उस प्राणायाम के सतत अभ्यास से सभी दोष नष्ट हो जाते हैं। साथ ही श्वास ( प्रश्वास ) – की गति भी न्यून होती जाती है। इस प्रकार प्राणों के [ श्वासों के ] नियन्त्रण से क्रमशः दिव्य शान्ति आदि सिद्धियाँ प्राप्त होने लगती हैं ॥ ५७ ॥ हे द्विजो! अब मैं क्रम से शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति तथा प्रसाद का वर्णन करूँगा। आरम्भ में इन चारों में से यहाँ पहले शान्ति के विषय में कहता हूँ । सहज तथा आगन्तुक पापों का नाश शान्ति कहा जाता है तथा वाणी पर भली-भाँति संयम प्रशान्ति कहा गया है ॥ ५८-५९ ॥ हे द्विजो! सभी तरह से सर्वदा प्रकाश की स्थिति को दीप्ति कहा गया है। सभी इन्द्रियों, बुद्धि तथा प्राणवायु आदि की प्रसन्नता को इस चतुष्टय में ‘प्रसाद’ कहा गया है। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त तथा धनंजय — इनकी जो प्रसन्नता है, उसे मरुतों का प्रसाद कहा गया है ॥ ६०-६२ ॥ जो वायु प्रयाण करता है, इसी कारण उस वायु को प्राणवायु कहा गया है। जो वायु आहार आदि को नीचे की ओर क्रम से ले जाता है, उसे अपान, सभी अंगों में जो वायु व्याप्त रहता है उसे व्यान तथा व्याधि आदि का प्रकोपक जो वायु मर्मों में उद्वेजन पैदा करता है उसे उदान एवं जो वायु गात्रों में समता करता है, उसे समान वायु कहा गया है। इस प्रकार ये पाँच वायु हुए। इसी तरह उद्गार ( डकार आदि) के समय क्रियाशील वायु को नाग, उन्मीलन – अवस्था में क्रियाशील वायु को कूर्म, छींक आदि में आने वाली वायु को कृकल, जम्हाई में क्रियाशील वायु देवदत्त तथा महाघोष करने वाले वायु का नाम धनंजय है, वह मरने पर भी सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है ॥ ६३-६६ ॥ हे विप्रो ! जो इन दस वायुओं को प्राणायाम से सिद्ध कर लेता है, वह शान्ति आदि चतुष्टय के प्रसाद की प्राप्ति कर लेता है । इन वायुओं का प्रसाद ही (शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति तथा प्रसाद नामक सिद्धियों में चतुर्थ प्रसाद नामक सिद्धि को) ‘तुरीया’ सिद्धि कहा जाता है ॥ ६७ ॥ विस्वर, महान्, प्रज्ञा, मन, ब्रह्मा, चिति, स्मृति, ख्याति, संवित्, ईश्वर तथा मति — ये सब महत्तत्त्वस्वरूप बुद्धि के नाम हैं । हे विप्रो ! इस बुद्धिका प्रसाद प्राणायाम से ही सिद्ध होता है ॥ ६८-६९ ॥ हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ मुनियो ! यह बुद्धि शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वों का उपतापन न होने से विस्वर, सभी तत्त्वों के पहले उत्पन्न होने से महान्, प्रमाणों का आश्रय होने से प्रज्ञा, मनन करने से मन तथा बृहत् होने एवं वृद्धि करने से ब्रह्मा — ऐसी कही गयी है ॥ ७०-७१ ॥ जो भोगों के लिये समस्त कर्मों का चयन करती है, उसे चिति कहा गया है। जो स्मरण करती है, उसे स्मृति तथा जो जानती है, उसे संवित् कहा गया है ॥ ७२ ॥ ज्ञान आदि अनेक उपायों से प्रतिष्ठित करने से ख्यातिसंज्ञक तथा सभी तत्त्वों का स्वामी एवं सब कुछ जानने के कारण ईश्वर संज्ञावाली बुद्धि कही गयी है। हे मतिमानों में श्रेष्ठ मुनियो ! मानने के कारण मति कही गयी एवं अर्थ को जानने तथा बोध कराने से बुद्धि कही गयी है ॥ ७३-७४ ॥ इस बुद्धि का भी प्रसाद प्राणायाम से सिद्ध होता है। योगी को प्राणायाम के द्वारा सभी दोषों को दग्ध कर डालना चाहिये ॥ ७५ ॥ हे यतिश्रेष्ठ विप्रो ! योगी को चाहिये कि वह धारणा से पाप को तथा प्रत्याहार से विषयों को विष समझकर दग्ध कर डाले। ध्यान के द्वारा [ काम-क्रोधादि ] अनीश्वर गुणों को जला डाले तथा समाधि से बुद्धि की वृद्धि करे । उत्तम स्थान प्राप्त करके तथा उचित आसनों में होकर आत्मवित् योगी को विधिपूर्वक योग के आठों अंगों का क्रम से अभ्यास करना चाहिये । समुचित स्थान तथा समय के विना योगसिद्धि नहीं होती है ॥ ७६–७८ ॥ अग्नि के समीप, जल में, सूखे पत्तों के ढेर वाले स्थानों में, जन्तुओं से व्याप्त जगह पर, श्मशान पर, जीर्ण गोशाला में, चौराहे पर, शोरगुल वाले स्थान में, डरावने स्थान में, पत्थरों तथा वल्मीक मिट्टी के ढेर पर, अपवित्र स्थान पर, दुष्टों के आतंक वाले स्थान पर, मच्छर आदि युक्त स्थान पर तथा देहबाधा और दौर्मनस्य ( मानसिक कष्ट) उत्पन्न करने वाले स्थान पर योग का अभ्यास नहीं करना चाहिये। अपितु अत्यन्त गुप्त (एकान्त), पवित्र तथा रमणीक स्थान पर, पर्वत की गुफा में, शिवक्षेत्र में, एकान्त में, शिव-उद्यान में, वन में, पवित्र घर में जन्तुओं से रहित तथा निर्जन स्थान में योग-साधन करना चाहिये ॥ ७९-८२ ॥ अत्यन्त स्वच्छ, भलीभाँति लिपे हुए, विशेष रूपसे चित्रित, दर्पण के समान स्वच्छ, कृष्ण अगरु के धूप से सुगन्धित, अनेक प्रकार के पुष्पों से मण्डित, ऊपर से चँदोवा आदि से अलंकृत, फल-पल्लवों से सुशोभित तथा कुश और फूल से युक्त दिव्य स्थान में ठीक आसन से बैठकर प्रसन्नतापूर्वक योग के अंगों का अभ्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् गुरु, शिव, पार्वती, गणेश तथा शिष्योंसहित योगीश्वरों को प्रणाम करके स्वस्तिक अथवा अर्ध पद्मासन (सिद्धासन) बाँधकर योगी को योग-साधन में प्रवृत्त हो जाना चाहिये ॥ ८३–८६ ॥ बुद्धिमान् योगी को इस प्रकार दोनों जानु बराबर करके अथवा एक जानु में स्थित होकर वृषण तथा लिङ्ग को दोनों पाणि (एड़ियों) के बीच करके दृढ़ आसन लगाकर तथा मुख को बन्द करके सिर को कुछ ऊँचा उठाकर दाँतों का परस्पर स्पर्श बचाते हुए, सभी ओर से दृष्टि को रोककर, उन्मीलित नेत्रों से अपने नासिकाग्र पर दृष्टि केन्द्रित करके तथा वक्ष:स्थल को आगे की ओर उन्नत कर तमोगुण को रजोगुण से तथा रजोगुण को सत्त्वगुण से आच्छादित करना चाहिये। इस प्रकार केवल सत्त्वगुण में स्थित होकर शिवध्यान का अभ्यास करना चाहिये ॥ ८७–९० ॥ समाहितचित्त होकर साधक को परम शुद्ध दीपशिखा की आकृतिवाले तथा ओंकार नाम से अभिहित उस परमात्मा का अपने हृदयकमल की कर्णिका में ध्यान करना चाहिये अथवा विद्वान् साधक को नाभि से तीन अंगुल नीचे अष्टकोणात्मक, पंचकोणात्मक अथवा त्रिकोणात्मक उत्तम कमल का ध्यान करके उसमें क्रमानुसार अपनी शक्तियोंसहित अग्निमण्डल, चन्द्रमण्डल, सूर्यमण्डल अथवा सूर्य-चन्द्र-अग्निमण्डल अथवा अग्नि, सूर्य, चन्द्रमण्डल का विधिवत् ध्यान करते हुए अग्नि के नीचे धर्म आदि चतुष्टय (धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य ) की कल्पना करके मण्डलों के ऊपर सत्त्व, रज तथा तम की भावना करते हुए पार्वती से सुशोभित सत्त्वस्थित रुद्र का चिन्तन करना चाहिये ॥ ९१-९५ ॥ इसी प्रकार नाभि, कण्ठ, भ्रूमध्य, ललाटपट्ट अथवा मस्तक में विधि के अनुसार शिव का ध्यान करना चाहिये ॥ ९६ ॥ क्रमानुसार द्विदल, षोडशदल, द्वादशदल, दशदल, षड्दल अथवा चतुर्दल कमल में शंकरजी का ध्यान करना चाहिये ॥ ९७ ॥ स्वर्ण की आभा वाले तथा अंगार के सदृश, महाश्वेत, द्वादश सूर्य के समान दीप्त, चन्द्रबिम्ब के सदृश, करोड़ों विद्युत् के समान प्रभा वाले, अग्निवर्ण के सदृश, विद्युत्-वलय के तुल्य आभा वाले उन-उन स्थानों में साधक को समाहितचित्त होकर परमेश्वर का चिन्तन करना चाहिये ॥ ९८-९९ ॥ करोड़ों वज्र की प्रभा वाले अथवा पद्मराग के सादृश्य वाले अथवा नीललोहित बिम्ब (सूर्यबिम्ब )-तुल्य स्थान में योगी को शिव ध्यान करना चाहिये ॥ १०० ॥ हृदयप्रदेश में महेश्वर का, नाभिकमल में सदाशिव का, ललाट में चन्द्रचूड का, भ्रूमध्य में साक्षात् शंकर का तथा दिव्य शाश्वत स्थान मूर्धा में शिव का ध्यान करना चाहिये ॥ १०११/२ ॥ वे शिव निर्मल हैं, कला अथवा अवयव से रहित हैं, ब्रह्मरूप हैं, शान्त हैं, ज्ञानस्वरूप हैं, लक्षणों से रहित हैं, अनिर्देश्य हैं, अणु से भी सूक्ष्म हैं, कल्याणकारी हैं, आश्रयरहित हैं, तर्कों से परे हैं, उत्पत्ति तथा विनाश से रहित हैं, मोक्षस्वरूप हैं, परम गति हैं, कल्याणरूप हैं, उपमारहित हैं, अमृतस्वरूप हैं, अविनाशी हैं, पुनर्भवरहित ब्रह्मस्वरूप हैं, अद्भुत हैं, महानन्द हैं, परानन्द हैं, योगानन्द हैं, व्याधिरहित हैं, त्याग तथा ग्रहण से रहित हैं, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर हैं, कल्याणमय हैं, स्वयंवेद्य हैं, अवेद्य हैं, परम ज्ञानयुक्त हैं, इन्द्रियों की पहुँच से परे हैं, आभास से परे हैं, परम तत्त्व हैं, परात्पर हैं, सभी उपाधियों से मुक्त हैं, विचारणापूर्वक ध्यान करने से प्राप्त होने वाले हैं, एकरूप हैं तथा तम से भी बढ़कर परम रूप में स्थित हैं। ऐसे महादेव का हृदयकमल में ध्यान करना चाहिये तथा नाभि में सर्वदेवात्मक प्रभु सदाशिव का ध्यान करना चाहिये ॥ १०२–१०८ ॥ विद्वान् तथा सुव्रत साधक को चाहिये कि वह शरीर के भीतर सुषुम्णा मार्ग से क्रमशः बारह मात्रात्मक मन्द कुम्भक, चौबीस मात्रात्मक मध्यम कुम्भक तथा छत्तीस मात्रात्मक उत्तम कुम्भक के द्वारा कल्याणप्रद, शुद्ध, देवस्वरूप तथा ज्ञानसम्पन्न प्रभु शंकर का ध्यान करे ॥ १०९-११० ॥ हृदयकमल तथा नाभिकमल में ध्यान केन्द्रित करके बुद्धिमान् साधक को बत्तीस मात्रात्मक रेचक करना चाहिये । अथवा हे उत्तम द्विजो! रेचक तथा पूरक छोड़कर केवल कुम्भक में ही स्थिर रहकर समरसतापूर्वक अपने हृदय में साक्षात् शिव का ध्यान करना चाहिये ॥ ११११/२ ॥ इस प्रकार समरस में स्थित विद्वान् साधक ईश्वर तथा जीव के ऐक्य को प्राप्त होकर उस रसजनित ब्रह्मानन्द की प्राप्ति कर लेता है ॥ ११२१/२ ॥ बारह प्राणायामों की एक धारणा होती है, बारह धारणाओं का एक ध्यान होता है तथा बारह ध्यानों की एक समाधि कही जाती है ॥ ११३१/२ ॥ हे विप्रो ! यह योगसिद्धि ज्ञानियों के समागम से अथवा प्रयत्न करने से प्राप्त होती है। वे दोनों साधन समान ही हैं। यह सिद्धि पूर्वजन्म के योगाभ्यासी साधक को शीघ्र तथा नवीनाभ्यासी साधक को विलम्ब से प्राप्त होती है । हे द्विजो ! योगसाधन की अवधि में बार-बार विघ्न भी उत्पन्न होते हैं, किंतु वे विघ्न निरन्तर अभ्यास करने से तथा गुरु के सान्निध्य से नष्ट भी हो जाते हैं ॥ ११४-११६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘अष्टांगयोगनिरूपण’ नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥ [^1]: आठ पैर वाला जीव, जो सिंह से भी बलवान् होता है – ‘अष्टपादः शरभः सिंहघाती । ‘ Content is available only for registered users. 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