अग्निपुराण – अध्याय 249 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ उनचासवाँ अध्याय धनुर्वेद [^1]  का वर्णन – युद्ध और अस्त्र के भेद, आठ प्रकार के स्थान, धनुष, बाण को ग्रहण करने और छोड़ने की विधि आदि का कथन धनुर्वेदः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं चार… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 248 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय विष्णु आदि के पूजन में उपयोगी पुष्पों का कथन पुष्पादिपूजाफलम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! पुष्पों से पूजन करने पर भगवान् श्रीहरि सम्पूर्ण कार्यों में सिद्धि प्रदान करते हैं। मालती, मल्लिका, यूथिका, गुलाब, कनेर, पावन्ती, अतिमुक्तक,… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 247 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय गृह के योग्य भूमि; चतुःषष्टिपद वास्तुमण्डल और वृक्षारोपण का वर्णन वास्तुलक्षणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं वास्तु के लक्षणों का वर्णन करता हूँ। वास्तुशास्त्र में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के लिये क्रमशः… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 246 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ छियालीसवाँ अध्याय रत्न-परीक्षण रत्नपरीक्षाः अग्निदेव कहते हैं — द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठ ! अब मैं रत्नों के लक्षणों का वर्णन करता हूँ। राजाओं को ये रत्न धारण करने चाहिये — वज्र (हीरा), मरकत, पद्मराग, मुक्ता, महानील, इन्द्रनील, वैदूर्य, गन्धसस्य, चन्द्रकान्त,… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 245 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय चामर, धनुष, बाण तथा खड्ग के लक्षण आयुधलक्षणादि अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! सुवर्णदण्डभूषित चामर उत्तम होता है। राजा के लिये हंसपक्ष, मयूरपक्ष या शुकपक्ष से निर्मित छत्र प्रशस्त माना गया है। वकपक्ष से निर्मित… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 244 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ चौवालीसवाँ अध्याय स्त्री के लक्षण स्त्रीलक्षणम् समुद्र कहते हैं — गर्गजी ! शरीर से उत्तम श्रेणी की स्त्री वह है, जिसके सम्पूर्ण अङ्ग मनोहर हों, जो मतवाले गजराज की भाँति मन्दगति से चलती हो, जिसके ऊरु और जघन… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 243 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पुरुष के लक्षण पुरुषलक्षणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! मैंने श्रीराम के प्रति वर्णित राजनीति का प्रतिपादन किया। अब मैं स्त्री-पुरुषों के लक्षण बतलाता हूँ, जिसका पूर्वकाल में भगवान् समुद्र ने गर्ग मुनि को उपदेश दिया… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 242 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ बयालीसवाँ अध्याय सेना के छः भेद, इनका बलाबल तथा छः अङ्ग राजनीतिः श्रीराम कहते हैं — छः प्रकार की सेना को कवच आदि से संनद्ध एवं व्यूहबद्ध करके इष्ट देवताओं की तथा संग्रामसम्बन्धी दुर्गा आदि देवियों की पूजा… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 241 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ इकतालीसवाँ अध्याय मन्त्रविकल्प सामादिः श्रीराम कहते हैं — ‘लक्ष्मण! प्रभावशक्ति और उत्साह–शक्ति से मन्त्रशक्ति श्रेष्ठ बतायी गयी है। प्रभाव और उत्साह से सम्पन्न शुक्राचार्य को देवपुरोहित बृहस्पति ने मन्त्र–बल से जीत लिया ॥ १ ॥ जो विश्वसनीय होने… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 240 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ चालीसवाँ अध्याय द्वादशराजमण्डल – चिन्तन [^1]  का वर्णन षाड्गुण्यम् श्रीराम कहते हैं — राजा को चाहिये कि वह मुख्य द्वादश राजमण्डल का चिन्तन करे। १. अरि, २. मित्र, ३. अरिमित्र, तत्पश्चात् ४. मित्रमित्र तथा ५. अरिमित्रमित्र — ये… Read More