अग्निपुराण – अध्याय 239 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ उनतालीसवाँ अध्याय श्रीराम की राजनीति का वर्णन राजधर्माः श्रीराम कहते हैं — लक्ष्मण! स्वामी (राजा), अमात्य (मन्त्री), राष्ट्र (जनपद), दुर्ग (किला), कोष (खजाना), बल (सेना) और सुहृत् (मित्रादि) – ये राज्य के परस्पर उपकार करनेवाले सात अङ्ग कहे… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 238 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ अड़तीसवाँ अध्याय श्रीराम के द्वारा उपदिष्ट राजनीति का वर्णन रामोक्तनीतिः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! मैंने तुमसे पुष्कर की कही हुई नीति का वर्णन किया है। अब तुम लक्ष्मण के प्रति श्रीरामचन्द्र द्वारा कही गयी विजयदायिनी नीति… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 237 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ सैंतीसवाँ अध्याय लक्ष्मीस्तोत्र और उसका फल ॥ श्रीस्तोत्र ॥ पुष्कर कहते हैं — परशुरामजी! पूर्वकाल में इन्द्र ने राज्यलक्ष्मी की स्थिरता के लिये जिस प्रकार भगवती लक्ष्मी की स्तुति की थी, उसी प्रकार राजा भी अपनी विजय के… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 236 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय संग्राम-दीक्षा-युद्ध के समय पालन करने योग्य नियमों का वर्णन रणदीक्षा पुष्कर कहते हैं — परशुरामजी ! अब मैं रणयात्रा की विधि बतलाते हुए संग्रामकाल के लिये उचित कर्तव्यों का वर्णन करूँगा। जब राजा की युद्धयात्रा एक… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 235 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय राजा की नित्यचर्या प्रात्यहिकराजकर्म पुष्कर कहते हैं — परशुरामजी ! अब निरन्तर किये जाने योग्य कर्म का वर्णन करता हूँ, जिसका प्रतिदिन आचरण करना उचित है। जब दो घड़ी रात बाकी रहे तो राजा नाना प्रकार… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 234 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ चौंतीसवाँ अध्याय दण्ड, उपेक्षा, माया और साम आदि नीतियों का उपयोग उपायषड्गुण्यम् पुष्कर कहते हैं — परशुरामजी ! साम, भेद, दान और दण्ड की चर्चा हो चुकी है और अपने राज्य में दण्ड का प्रयोग कैसे करना चाहिये… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 233 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय यात्रा के मुहूर्त और द्वादश राजमण्डल का विचार यात्रामण्डलचिन्तादिः पुष्कर कहते हैं — अब मैं राजधर्म का आश्रय लेकर सबकी यात्रा के विषय में बताऊँगा। जब शुक्र अस्त हों अथवा नीच स्थान में स्थित हों, विकलाङ्ग… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 232 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ बत्तीसवाँ अध्याय कौए, कुत्ते, गौ, घोड़े और हाथी आदि के द्वारा होनेवाले शुभाशुभ शकुनों का वर्णन शकुनानि पुष्कर कहते हैं — जिस मार्ग से बहुतेरे कौए शत्रु के नगर में प्रवेश करें, उसी मार्ग से घेरा डालने पर… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 231 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ इकतीसवाँ अध्याय शकुन के भेद तथा विभिन्न जीवों के दर्शन से होनेवाले शुभाशुभ फल शकुनानि पुष्कर कहते हैं — राजा के ठहरने, जाने अथवा प्रश्न करने के समय होने वाले शकुन उसके देश और नगर के लिये शुभ… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 230 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ तीसवाँ अध्याय अशुभ और शुभ शकुन शकुनानि पुष्कर कहते हैं — परशुरामजी ! श्वेत वस्त्र, स्वच्छ जल, फल से भरा हुआ वृक्ष, निर्मल आकाश, खेत में लगे हुए अन्न और काला धान्य- इनका यात्रा के समय दिखायी देना… Read More