अग्निपुराण – अध्याय 263 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ तिरसठवाँ अध्याय नाना प्रकार के उत्पात और उनकी शान्ति के उपाय उत्पातशान्तिः पुष्कर कहते हैं — परशुराम ! प्रत्येक वेद के ‘श्रीसूक्त’ को जानना चाहिये। वह लक्ष्मी की वृद्धि करने वाला है। ‘हिरण्यवर्णा हरिर्णी’ इत्यादि पंद्रह ऋचाएँ ऋग्वेदीय… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 262 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ बासठवाँ अध्याय अथर्वविधान – अथर्ववेदोक्त मन्त्रों का विभिन्न कर्मों में विनियोग अथर्वव विधानम् पुष्कर कहते हैं — परशुराम ! ‘सामविधान’ कहा गया। अब मैं ‘अथर्व विधान का वर्णन करूँगा। शान्तातीयगण के उद्देश्य से हवन कर के मानव शान्ति… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 261 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ इकसठवाँ अध्याय सामविधान – सामवेदोक्त मन्त्रों का भिन्न-भिन्न कार्यों के लिये प्रयोग सामविधानं पुष्कर कहते हैं — परशुराम। मैंने तुम्हें ‘यजुर्विधान’ कह सुनाया, अब मैं ‘सामविधान’ कहूँगा। ‘वैष्णवी-संहिता’ का जप करके उसका दशांश होम करे। इस से मनुष्य… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 260 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ साठवाँ अध्याय यजुर्विधान-यजुर्वेद के विभिन्न मन्त्रों का विभिन्न कार्यों के लिये प्रयोग यजुर्विधानं पुष्कर कहते हैं — परशुराम! अब मैं भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले  ‘यजुर्विधान’ का वर्णन करता हूँ, सुनो। ॐकार-संयुक्त महाव्याहृतियाँ समस्त पापों का विनाश… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 259 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ उनसठवाँ अध्याय ऋग्विधान-विविध कामनाओं की सिद्धि के लिये प्रयुक्त होने वाले ऋग्वेदीय मन्त्रों का निर्देश ऋग्विधानं अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं महर्षि पुष्कर के द्वारा परशुरामजी के प्रति वर्णित ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का विधान… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 258 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ अट्ठावनवाँ अध्याय व्यवहार के वाक्पारुष्य, दण्डपारुष्य, साहस, विक्रियासम्प्रदान, सम्भूय-समुत्थान, स्तेय, स्त्री-संग्रहण तथा प्रकीर्णक- इन विवादास्पद विषयों पर विचार वाक्‌पारुष्यादिप्रकरणं वाक्पारुष्य [अब ‘वाक्पारुष्य’ (कठोर गाली देने आदि) के विषय में विचार किया जाता है। इसका लक्षण नारदजी ने इस… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 257 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय सीमा-विवाद, स्वामिपाल विवाद, अस्वामिविक्रय, दत्ताप्रदानिक, क्रीतानुशय, अभ्युपेत्याशुश्रूषा, संविद्व्यतिक्रम, वेतनादान तथा द्यूतसमाह्वय का विचार सीमाविवादादिनिर्णयः सीमा-विवाद अग्निदेव कहते हैं — दो गाँवों से सम्बन्ध रखने वाले खेत की सीमा के विषय में विवाद उपस्थित होने पर तथा… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 256 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ छप्पनवाँ अध्याय पैतृक धन के अधिकारी; पत्नियों का धनाधिकार; पितामह के धन के अधिकारी; विभाज्य और अविभाज्य धन; वर्ण क्रम से पुत्रों के धनाधिकार; बारह प्रकार के पुत्र और उनके अधिकार पत्नी पुत्री आदि के, संसृष्टी के धन… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 255 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ पचपनवाँ अध्याय साक्षी, लेखा तथा दिव्यप्रमाणों के विषय में विवेचन दिव्यानि प्रमाणानि ‘साक्षी-प्रकरण’ अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ। तपस्वी, कुलीन, दानशील, सत्यवादी, कोमल हृदय, धर्मात्मा, पुत्रयुक्त, धनी, पञ्चयज्ञ आदि वैदिक क्रियाओं से युक्त अपनी जाति और वर्ग के… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 254 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ चौवनवाँ अध्याय ऋणादान तथा उपनिधि सम्बन्धी विचार व्यवहारः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! यदि ऋण लेने वाले पुरुष के अनेक ऋणदाता साहु हों और वे सब के-सब एक ही जाति के हों तो राजा उन्हें ग्रहणक्रम के… Read More