अग्निपुराण – अध्याय 253 अग्निपुराण – अध्याय 253 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ तिरपनवाँ अध्याय व्यवहारशास्त्र तथा विविध व्यवहारों का वर्णन व्यवहारः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं व्यवहार का वर्णन करता हूँ, जो नय और अनय का विवेक प्रदान करने वाला है। उसके चार चरण, चार स्थान और चार… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 252 अग्निपुराण – अध्याय 252 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ बावनवाँ अध्याय तलवार के बत्तीस हाथ, पाश, चक्र, शूल, तोमर, गदा, परशु, मुद्गर, भिन्दिपाल, वज्र, कृपाण, क्षेपणी, गदायुद्ध तथा मल्लयुद्धके दाँव और पैंतरों का वर्णन धनुर्वेदकथनम् अग्निदेव कहते हैं — ब्रह्मन् । भ्रान्त, उद्घान्त,आविद्ध, आप्लुत, विप्लुत, प्लुत (या… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 251 अग्निपुराण – अध्याय 251 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ इक्यावनवाँ अध्याय पाश के निर्माण और प्रयोग की विधि तथा तलवार और लाठी को अपने पास रखने एवं शत्रु पर चलाने की उपयुक्त पद्धति का निर्देश धनुर्वेदकथनम् अग्निदेव कहते हैं — ब्रह्मन् ! जिसने हाथ, मन और दृष्टि… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 250 अग्निपुराण – अध्याय 250 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ पचासवाँ अध्याय लक्ष्यवेध के लिये धनुष-बाण लेने और उनके समुचित प्रयोग करने की शिक्षा तथा वेध्य के विविध भेदों का वर्णन धनुर्वेदकथनम् अग्निदेव कहते हैं — ब्रह्मन् ! द्विज को चाहिये कि पूरी लम्बाईवाले धनुष का निर्माण कराकर,… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 249 अग्निपुराण – अध्याय 249 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ उनचासवाँ अध्याय धनुर्वेद [^1] का वर्णन – युद्ध और अस्त्र के भेद, आठ प्रकार के स्थान, धनुष, बाण को ग्रहण करने और छोड़ने की विधि आदि का कथन धनुर्वेदः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं चार… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 248 अग्निपुराण – अध्याय 248 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय विष्णु आदि के पूजन में उपयोगी पुष्पों का कथन पुष्पादिपूजाफलम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! पुष्पों से पूजन करने पर भगवान् श्रीहरि सम्पूर्ण कार्यों में सिद्धि प्रदान करते हैं। मालती, मल्लिका, यूथिका, गुलाब, कनेर, पावन्ती, अतिमुक्तक,… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 247 अग्निपुराण – अध्याय 247 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय गृह के योग्य भूमि; चतुःषष्टिपद वास्तुमण्डल और वृक्षारोपण का वर्णन वास्तुलक्षणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं वास्तु के लक्षणों का वर्णन करता हूँ। वास्तुशास्त्र में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के लिये क्रमशः… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 246 अग्निपुराण – अध्याय 246 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ छियालीसवाँ अध्याय रत्न-परीक्षण रत्नपरीक्षाः अग्निदेव कहते हैं — द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठ ! अब मैं रत्नों के लक्षणों का वर्णन करता हूँ। राजाओं को ये रत्न धारण करने चाहिये — वज्र (हीरा), मरकत, पद्मराग, मुक्ता, महानील, इन्द्रनील, वैदूर्य, गन्धसस्य, चन्द्रकान्त,… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 245 अग्निपुराण – अध्याय 245 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय चामर, धनुष, बाण तथा खड्ग के लक्षण आयुधलक्षणादि अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! सुवर्णदण्डभूषित चामर उत्तम होता है। राजा के लिये हंसपक्ष, मयूरपक्ष या शुकपक्ष से निर्मित छत्र प्रशस्त माना गया है। वकपक्ष से निर्मित… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 244 अग्निपुराण – अध्याय 244 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ चौवालीसवाँ अध्याय स्त्री के लक्षण स्त्रीलक्षणम् समुद्र कहते हैं — गर्गजी ! शरीर से उत्तम श्रेणी की स्त्री वह है, जिसके सम्पूर्ण अङ्ग मनोहर हों, जो मतवाले गजराज की भाँति मन्दगति से चलती हो, जिसके ऊरु और जघन… Read More