अग्निपुराण – अध्याय 233 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय यात्रा के मुहूर्त और द्वादश राजमण्डल का विचार यात्रामण्डलचिन्तादिः पुष्कर कहते हैं — अब मैं राजधर्म का आश्रय लेकर सबकी यात्रा के विषय में बताऊँगा। जब शुक्र अस्त हों अथवा नीच स्थान में स्थित हों, विकलाङ्ग… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 232 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ बत्तीसवाँ अध्याय कौए, कुत्ते, गौ, घोड़े और हाथी आदि के द्वारा होनेवाले शुभाशुभ शकुनों का वर्णन शकुनानि पुष्कर कहते हैं — जिस मार्ग से बहुतेरे कौए शत्रु के नगर में प्रवेश करें, उसी मार्ग से घेरा डालने पर… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 231 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ इकतीसवाँ अध्याय शकुन के भेद तथा विभिन्न जीवों के दर्शन से होनेवाले शुभाशुभ फल शकुनानि पुष्कर कहते हैं — राजा के ठहरने, जाने अथवा प्रश्न करने के समय होने वाले शकुन उसके देश और नगर के लिये शुभ… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 230 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ तीसवाँ अध्याय अशुभ और शुभ शकुन शकुनानि पुष्कर कहते हैं — परशुरामजी ! श्वेत वस्त्र, स्वच्छ जल, फल से भरा हुआ वृक्ष, निर्मल आकाश, खेत में लगे हुए अन्न और काला धान्य- इनका यात्रा के समय दिखायी देना… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 229 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ उनतीसवाँ अध्याय अशुभ और शुभ स्वप्नों का विचार स्वप्नाध्यायः पुष्कर कहते हैं — अब मैं शुभाशुभ स्वप्नों का वर्णन करूँगा तथा दुःस्वप्न-नाश के उपाय भी बतलाऊँगा । नाभि के सिवा शरीर के अन्य अंगों में तृण और वृक्षों… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 228 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय युद्ध–यात्रा के सम्बन्ध में विचार युद्धयात्रा पुष्कर कहते हैं — जब राजा यह समझ ले कि किसी बलवान् आक्रन्द [^1]  (राजा) के द्वारा मेरा पार्ष्णिग्राह[^2]  राजा पराजित कर दिया गया है तो वह सेना को युद्ध… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 227 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय अपराधों के अनुसार दण्ड के प्रयोग राजधर्माः दण्डप्रणयनं पुष्कर कहते हैं — राम! अब मैं दण्डनीति का प्रयोग बतलाऊँगा, जिससे राजा को उत्तम गति प्राप्त होती है। तीन जौ का एक ‘कृष्णल’ समझना चाहिये, पाँच कृष्णल… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 226 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ छब्बीसवाँ अध्याय पुरुषार्थ की प्रशंसा; साम आदि उपायों का प्रयोग तथा राजा की विविध देवरूपता का प्रतिपादन राजधर्माः पुष्कर कहते हैं — परशुरामजी ! दूसरे शरीर से उपार्जित किये हुए अपने ही कर्म का नाम ‘दैव’ समझिये। इसलिये… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 225 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ पचीसवाँ अध्याय राज-धर्म-राजपुत्र-रक्षण आदि राजधर्माः पुष्कर कहते हैं — राजा को अपने पुत्र की रक्षा करनी चाहिये तथा उसे धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और धनुर्वेद की शिक्षा देनी चाहिये । साथ ही अनेक प्रकार के शिल्पों की शिक्षा देनी… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 224 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ चौबीसवाँ अध्याय अन्तःपुर के सम्बन्ध में राजा के कर्त्तव्य; स्त्री की विरक्ति और अनुरक्ति की परीक्षा तथा सुगन्धित पदार्थों के सेवन का प्रकार स्त्रीरक्षादिकामशास्त्रं पुष्कर कहते हैं — अब मैं अन्तःपुर के विषय में विचार करूँगा। धर्म, अर्थ… Read More