अग्निपुराण – अध्याय 223 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ तेईसवाँ अध्याय राष्ट्र की रक्षा तथा प्रजा से कर लेने आदि के विषय में विचार राजधर्माः पुष्कर कहते हैं — (राज्य का प्रबन्ध इस प्रकार करना चाहिये) राजा को प्रत्येक गाँव का एक-एक अधिपति नियुक्त करना चाहिये। फिर… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 222 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ बाईसवाँ अध्याय राजा के दुर्ग, कर्तव्य तथा साध्वी स्त्री के धर्म का वर्णन दुर्गसम्पत्तिः पुष्कर कहते हैं — अब मैं दुर्ग बनाने के विषय में कहूँगा । राजा को दुर्गदेश ( दुर्गम प्रदेश अथवा सुदृढ़ एवं विशाल किले)… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 221 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय अनुजीवियों का राजा के प्रति कर्तव्य का वर्णन अनुजीविवृत्तं पुष्कर कहते हैं — भृत्य को राजा की आज्ञा का उसी प्रकार पालन करना चाहिये, जैसे शिष्य गुरु की और साध्वी स्त्रियाँ अपने पति की आज्ञा का… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 220 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ बीसवाँ अध्याय राजा के द्वारा अपने सहायकों की नियुक्ति और उनसे काम लेने का ढंग सहायसम्पत्तिः पुष्कर कहते हैं — अभिषेक हो जाने पर उत्तम राजा के लिये यह उचित है कि वह मन्त्री को साथ लेकर शत्रुओं… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 219 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय राजा के अभिषेक के समय पढ़नेयोग्य मन्त्र अभिषेकमन्त्राः पुष्कर ने कहा —  अब मैं राजा और देवता आदि के अभिषेक सम्बन्धी मन्त्रों का वर्णन करूँगा, जो सम्पूर्ण पापों को दूर करनेवाले हैं। कलश से कुशयुक्त जल… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 218 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ अठारहवाँ अध्याय राजा के अभिषेक की विधि राज्यभिषेकः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! पूर्वकाल में परशुरामजी के पूछने पर पुष्कर ने उनसे जिस प्रकार राजधर्म का वर्णन किया था, वही मैं तुमसे बतला रहा हूँ ॥ १ ॥… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 217 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ सत्रहवाँ अध्याय गायत्री से निर्वाण की प्राप्ति वसिष्ठकृत लिंगमूर्ति स्तुति अथवा श्रीपरमेश्वरस्तोत्र गायत्रीनिर्वाणं अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! किसी अन्य वसिष्ठ ने गायत्री जपपूर्वक लिङ्गमूर्ति शिव की स्तुति करके भगवान् शंकर से निर्वाणस्वरूप परब्रह्म की प्राप्ति की ॥… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 216 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ सोलहवाँ अध्याय गायत्री मन्त्र के तात्पर्यार्थ का वर्णन गायत्रीनिर्वाणं अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! इस प्रकार संध्या का विधान करके गायत्री का जप और स्मरण करे। यह अपना गान करनेवाले साधकों के शरीर और प्राणों का त्राण… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 215 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ पंद्रहवाँ अध्याय संध्या-विधि सन्ध्याविधिः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! जो पुरुष ॐकार को जानता है, वह योगी और विष्णुस्वरूप है। इसलिये सम्पूर्ण मन्त्रों के सारस्वरूप और सब कुछ देनेवाले ॐकार का अभ्यास करना चाहिये । समस्त मन्त्रों के… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 214 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ चौदहवाँ अध्याय नाड़ीचक्र का वर्णन मन्त्रमाहात्म्यं अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं नाड़ीचक्र के विषय में कहता हूँ, जिसके जानने से श्रीहरि का ज्ञान हो जाता है। नाभि के अधोभाग में कन्द (मूलाधार) है, उससे अङ्कुरों… Read More