अग्निपुराण – अध्याय 243 अग्निपुराण – अध्याय 243 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पुरुष के लक्षण पुरुषलक्षणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! मैंने श्रीराम के प्रति वर्णित राजनीति का प्रतिपादन किया। अब मैं स्त्री-पुरुषों के लक्षण बतलाता हूँ, जिसका पूर्वकाल में भगवान् समुद्र ने गर्ग मुनि को उपदेश दिया… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 242 अग्निपुराण – अध्याय 242 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ बयालीसवाँ अध्याय सेना के छः भेद, इनका बलाबल तथा छः अङ्ग राजनीतिः श्रीराम कहते हैं — छः प्रकार की सेना को कवच आदि से संनद्ध एवं व्यूहबद्ध करके इष्ट देवताओं की तथा संग्रामसम्बन्धी दुर्गा आदि देवियों की पूजा… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 241 अग्निपुराण – अध्याय 241 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ इकतालीसवाँ अध्याय मन्त्रविकल्प सामादिः श्रीराम कहते हैं — ‘लक्ष्मण! प्रभावशक्ति और उत्साह–शक्ति से मन्त्रशक्ति श्रेष्ठ बतायी गयी है। प्रभाव और उत्साह से सम्पन्न शुक्राचार्य को देवपुरोहित बृहस्पति ने मन्त्र–बल से जीत लिया ॥ १ ॥ जो विश्वसनीय होने… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 240 अग्निपुराण – अध्याय 240 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ चालीसवाँ अध्याय द्वादशराजमण्डल – चिन्तन [^1] का वर्णन षाड्गुण्यम् श्रीराम कहते हैं — राजा को चाहिये कि वह मुख्य द्वादश राजमण्डल का चिन्तन करे। १. अरि, २. मित्र, ३. अरिमित्र, तत्पश्चात् ४. मित्रमित्र तथा ५. अरिमित्रमित्र — ये… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 239 अग्निपुराण – अध्याय 239 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ उनतालीसवाँ अध्याय श्रीराम की राजनीति का वर्णन राजधर्माः श्रीराम कहते हैं — लक्ष्मण! स्वामी (राजा), अमात्य (मन्त्री), राष्ट्र (जनपद), दुर्ग (किला), कोष (खजाना), बल (सेना) और सुहृत् (मित्रादि) – ये राज्य के परस्पर उपकार करनेवाले सात अङ्ग कहे… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 238 अग्निपुराण – अध्याय 238 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ अड़तीसवाँ अध्याय श्रीराम के द्वारा उपदिष्ट राजनीति का वर्णन रामोक्तनीतिः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! मैंने तुमसे पुष्कर की कही हुई नीति का वर्णन किया है। अब तुम लक्ष्मण के प्रति श्रीरामचन्द्र द्वारा कही गयी विजयदायिनी नीति… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 237 अग्निपुराण – अध्याय 237 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ सैंतीसवाँ अध्याय लक्ष्मीस्तोत्र और उसका फल ॥ श्रीस्तोत्र ॥ पुष्कर कहते हैं — परशुरामजी! पूर्वकाल में इन्द्र ने राज्यलक्ष्मी की स्थिरता के लिये जिस प्रकार भगवती लक्ष्मी की स्तुति की थी, उसी प्रकार राजा भी अपनी विजय के… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 236 अग्निपुराण – अध्याय 236 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय संग्राम-दीक्षा-युद्ध के समय पालन करने योग्य नियमों का वर्णन रणदीक्षा पुष्कर कहते हैं — परशुरामजी ! अब मैं रणयात्रा की विधि बतलाते हुए संग्रामकाल के लिये उचित कर्तव्यों का वर्णन करूँगा। जब राजा की युद्धयात्रा एक… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 235 अग्निपुराण – अध्याय 235 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय राजा की नित्यचर्या प्रात्यहिकराजकर्म पुष्कर कहते हैं — परशुरामजी ! अब निरन्तर किये जाने योग्य कर्म का वर्णन करता हूँ, जिसका प्रतिदिन आचरण करना उचित है। जब दो घड़ी रात बाकी रहे तो राजा नाना प्रकार… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 234 अग्निपुराण – अध्याय 234 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ चौंतीसवाँ अध्याय दण्ड, उपेक्षा, माया और साम आदि नीतियों का उपयोग उपायषड्गुण्यम् पुष्कर कहते हैं — परशुरामजी ! साम, भेद, दान और दण्ड की चर्चा हो चुकी है और अपने राज्य में दण्ड का प्रयोग कैसे करना चाहिये… Read More