भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १४८
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – १४८
भगवान् सूर्यके कालात्मक चक्रका वर्णन

सुमन्तु मुनि बोले — राजन् ! एक बार महातेजस्वी साम्ब ने अपने पिता भगवान् श्रीकृष्ण के हाथ में ज्वालामालाओं से प्रदीप्त सुदर्शनचक्र को देखकर पूछा — ‘देव ! आपके हाथ में जो यह सूर्य के समान चक्र दिखलायी दे रहा है, यह आपको कैसे प्राप्त हुआ तथा भगवान् सूर्य के चक्र को कमल की उपमा कैसे दी गयी है ? इसे आप बतायें ।om, ॐभगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाबाहो ! तुमने अच्छी बात पूछी है, इसे मैं संक्षेप में बतला रहा हूँ । मैंने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक दिव्य हजार वर्षों तक भगवान् सूर्य की आराधना कर इस चक्र को प्राप्त किया है । भगवान् भास्कर आकाश में विचरण करते रहते हैं, जिनके रथ-चक्र के नाभिमण्डल में चन्द्र आदि ग्रह अवस्थित हैं । अरों में द्वादश आदित्य बतलाये गये हैं, पृथ्वी आदि तत्त्व मार्ग में पड़ने वाले तत्त्व हैं. इन तत्त्वों से यह कालात्मक चक्र व्याप्त है । भगवान् सूर्य ने अपने इस चक्र समान ही दूसरा चक्र मुझे प्रदान किया है ।

इस कमलरूप चक्र के षट्दल ही छः ऋतुएँ हैं । कमल के मध्य में जो पुरुष अधिष्ठित हैं, वे ही भगवान सूर्य हैं । जो भूत, भविष्य तथा वर्तमान तीन काल कहे गये हैं, वे चक्र की तीन नाभियाँ हैं । बारह महीने अरे तथा पक्ष परिधियाँ हैं, नेमियाँ दक्षिणायन तथा उत्तरायण दो अयन है, नक्षत्र, ग्रह तथा योग आदि भी इसी चक्र में अवस्थित हैं । स्थूल और सूक्ष्म के भेद से यह चक्र सर्वत्र व्याप्त है ।
दुष्टों का दमन करने के लिये मैंने इस चक्र को आराधना के द्वारा भगवान् सूर्य से प्राप्त किया है । इसलिये ग्रहों और तत्त्वों से समन्वित इस चक्र की मैं निरन्तर पूजा करता रहता हूँ । जो चक्र में स्थित भगवान् सूर्य की भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह तेज में भगवान् सूर्य के समान हो जाता है । सप्तमी को जो भगवान् सूर्य का चक्र अङ्कित कर उनकी रक्तचन्दन , करवीरपुष्य, कुंकुम, रक्त कमल, धूप, दीप, नैवेद्य, चामर, छत्र एवं फल आदि से पूजा करता है तथा विविध नैवेद्यों का भोग लगाता है, पुण्य कथाओं का श्रवण करता है, वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेता है । इसी प्रकार जो संक्रान्ति तथा ग्रहण आदि में चक्र की पूजा करता है, उसके ऊपर सभी ग्रह प्रसन्न हो जाते हैं, वह सम्पूर्ण रोगों और दुःख से रहित हो जाता है तथा समस्त ऐश्वर्यों से युक्त होकर चिरजीवी होता है ।
(अध्याय १४८)
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