वैदिक गणेश स्तवन
गणानां त्वा गणपतिं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे निधीनां त्वा निधिपतिं हवामहे वसो मम ।
आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ।।

(शु॰यजु॰ २३।१९)
हे परमदेव गणेशजी ! समस्त गणों के अधिपति एवं प्रिय पदार्थों प्राणियों के पालक और समस्त सुखनिधियों के निधिपति ! आपका हम आवाहन करते हैं । आप सृष्टि को उत्पन्न करने वाले हैं, हिरण्यगर्भ को धारण करने वाले अर्थात् संसार को अपने-आप में धारण करने वाली प्रकृति के भी स्वामी हैं, आपको हम प्राप्त हों ।।

नि षु सीद गणपते गणेषु त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम् ।
न ऋते त्वत्क्रियते किं चनारे महामर्कं मघवञ्चित्रमर्च ।।

(ऋक॰ १०।११२।९)
हे गणपते ! आप स्तुति करने वाले हम लोगों के मध्य में भली प्रकार स्थित होइये । आपको क्रान्तदर्शी कवियों में अतिशय बुद्धिमान्-सर्वज्ञ कहा जाता है । आपके बिना कोई भी शुभाशुभ कार्य आरम्भ नहीं किया जाता । (इसलिये) हे भगवन् (मघवन्) ! ऋद्धि-सिद्धि के अधिष्ठाता देव ! हमारी इस पूजनीय प्रार्थना को स्वीकार कीजिये ।।

गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् ।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः श्रृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ।।

(ऋक॰ २।२३।१)
हे अपने गणों में गणपति (देव), क्रान्तदर्शियों (कवियों) – में श्रेष्ठ कवि, शिवा-शिव के प्रिय ज्येष्ठ पुत्र, अतिशय भोग और सुख आदि के दाता ! हम आपका आवाहन करते हैं । हमारी स्तुतियों को सुनते हुए पालनकर्ता के रुप में आप इस सदन में आसीन हों ।।

नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नमो
व्रातेभ्यो व्रातपतिभ्यश्च वो नमो नमो
गृत्सेभ्यो गृत्सपतिभ्यश्च वो नमो नमो
विरुपेभ्यो विश्वरुपेभ्यश्च वो नमः ।।

(शुक्ल यजु॰ १६।२५)
देवानुचर गण-विशेषों को, विश्वनाथ महाकालेश्वर आदि की तरह पीठभेद से विभिन्न गणपतियों को, संघों को, संघ-पतियों को, बुद्धिशालियों को, बुद्धिशालियों के परिपालन करने वाले उनके स्वामियों को, दिगम्बर-परमहंस-जटिलादि चतुर्थाश्रमियों को तथा सकलात्मदर्शियों को नमस्कार है ।।

ॐ तत्कराटाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।। (कृ॰ यजुर्वेदीय मैत्रायणी॰ २।९।१।६)
उन कराट (सूँड़ को घुमाने वाले) भगवान् गणपति को हम जानते हैं, गजवदन का हम धऽयान करते हैं, वे दन्ती सन्मार्ग पर चलने के लिये हमें प्रेरित करें ।

नमो व्रातपतये नमो गणपतये नमः प्रमथपतये नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्ननाशिने शिवसुताय श्रीवरद-मूर्तये नमः ।। (कृ॰ यजुर्वेदीय गणपत्यथर्वशीर्ष १०)
व्रातपति को नमस्कार, गणपति को नमस्कार, प्रमथपति को नमस्कार; लम्बोदर, एकदन्त, विघ्न-नाशक, शिव-तनय श्रीवरदमूर्ति को नमस्कार है ।

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