August 31, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-76 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ छिहत्तरवाँ अध्याय श्रीगणेशजी के चार अक्षरवाले ‘गजानन’ नाम- मन्त्र के माहात्म्य में ब्राह्मण-पुत्र बुध का आख्यान, शापवश वैश्यकुल में उत्पन्न बुध का कुष्ठी होना और ‘गजानन’ नाम- मन्त्र के श्रवण से उसे विनायक धाम की प्राप्ति अथः षट्सप्ततितमोऽध्यायः सङ्कष्टचतुर्थीमाहात्म्यकथनं दूत बोले — प्राचीनकाल की बात है, गौड़ देश के गौड़ नामक नगर में [दूर्व नामक ] एक ब्राह्मण निवास करता था। वह तपस्वी, ज्ञानी, बुद्धिमान् तथा देवता और ब्राह्मणों की पूजा करने वाला था ॥ १ ॥ उसका ही यह पुत्र उत्पन्न हुआ था। इसकी माता का नाम शाकिनी तथा पत्नी का नाम सावित्री था, जो सावित्री के समान पतिव्रता थी ॥ २ ॥ माता-पिता का अकेला पुत्र होने के कारण उनके स्नेहवश वह अनेक आभूषणों से अलंकृत रहता था। वह अत्यन्त सुन्दर था और रति के स्वामी कामदेव के समान सुशोभित होता था ॥ ३ ॥ उसके माता-पिता एक क्षण के लिये भी उसका वियोग नहीं चाहते थे। जब वह युवावस्था को प्राप्त हुआ तो अपनी उस भार्या का परित्यागकर वह नित्य ही परायी स्त्री में निरत रहने लगा । वह दूसरे की निन्दा में परायण, पापकर्म में निरत तथा पिता-माता की आज्ञा का उल्लंघन करनेवाला हो गया ॥ ४-५ ॥ एक दिन की बात है, उस गौड़नगर में पुरुषों को मोहित करने वाली एक वेश्या आयी। उस वेश्या के प्रति आसक्त मनवाले उसने जो किया, उसे तुम सुनो ॥ ६ ॥ उसने अपने माता-पिता के समक्ष ही अपने आभूषणों को बलपूर्वक उतारकर एक पेटिका में रखा और फिर छिपकर उन आभूषणों को उस वेश्या को प्रदानकर उसने बहुत समय तक उसके साथ रमण किया। वह सुगन्धित द्रव्यों का अनुलेपन कर सभी ऐन्द्रिय विषयों का परित्यागकर केवल उसीमें उसी प्रकार निष्ठावान् हो गया, जैसे कि एक योगी ब्रह्मपरायण हो जाता है। वह कामाग्नि से उसी प्रकार विह्वल हो गया, जैसे मद्यपान के प्रभाव से व्यक्ति मतवाला हो जाता है ॥ ७–९ ॥ अत्यन्त दुखी तथा भूख-प्यास की परवाह किये बिना उसका पिता नगर के प्रत्येक घर में अपने पुत्र को खोजने लगा ॥ १० ॥ पुत्रके कहीं नहीं दिखायी पड़ने पर उसका पिता लम्बी-लम्बी साँस लेता हुआ आधी रात में घर पहुँचा और अपनी पत्नी से बोला — ‘हमारा पुत्र बुध न जाने कहाँ चला गया। उस पुत्र के बिना हमारा घर वैसे ही व्यर्थ हो गया है जैसे दीपक के बिना रात्रि, जल के बिना बावड़ी और सन्तान के बिना स्त्री निरर्थक हो जाती है । हमारे प्राणों की रक्षा करने वाले उसका दर्शन अब हमें कब होगा?’ ॥ ११–१२१/२ ॥ शाकिनी बोली — मैं भूख तथा प्यास से अत्यन्त व्याकुल और चिन्ता तथा शोक से ग्रस्त हो गयी हूँ, हे नाथ! न जाने हमारा वह प्रिय पुत्र कहाँ चला गया है, यदि मुझे उसका दर्शन हो जाय, तभी मैं जीवित रहूँगी अन्यथा मैं मृत्यु को प्राप्त हो जाऊँगी ॥ १३-१४ ॥ [तब] वह दूर्व नामक ब्राह्मण हाथ में लाठी लेकर पुनः अपने पुत्र को ढूँढ़ने निकल पड़ा। रास्ते में जिस- जिसको वह देखता, उस-उससे अपने पुत्र के विषय में पूछता जाता था ॥ १५ ॥ जब वह अत्यन्त थक गया और भूख से व्याकुल हो उठा तो उसे चक्कर आने लगा, उसी समय उसे अन्त्यवर्ण में उत्पन्न एक अत्यन्त वृद्ध तथा महाभयंकर भीम नामवाला पुरुष दिखायी पड़ा, उसने [जब] उससे [भी] अपने पुत्र के विषय में पूछा तो उसने अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में उत्तर दिया ॥ १६ ॥ भीम बोला —बुध नामक तुम्हारा वह बुद्धिमान् पुत्र वेश्या के घर में है और वह कामासक्त होकर सुखपूर्वक क्रीड़ा कर रहा है। इस संसार में कौन किसका पुत्र है, कौन माता है तथा कौन पिता है ? अर्थात् कोई किसी का नहीं है । हे द्विजश्रेष्ठ ! तुम व्यर्थ ही कष्ट उठा रहे हो ॥ १७ ॥ दूर्व बोला — मेरा पुत्र बुध कैसे वेश्या में आसक्त हो गया? तब वह शीघ्र ही उस वेश्या के घर गया, और वहाँ उसने अपने उस पुत्र को देखा ॥ १८ ॥ वह अत्यन्त मदोन्मत्त था, मदिरा का सेवन करने से उसकी आँखें लाल-लाल थीं और वह नशे में चूर था, पिता ने हाथ पकड़कर उसे उठाया तथा क्रुद्ध होकर उस पुत्र को डाँटा — ‘अरे दुष्ट! तुमसे तो यह काँटेवाला वृक्ष अच्छा है अथवा यह पत्थर अच्छा है, तुम प्राणों का परित्याग क्यों नहीं कर देते ? तुम्हारे जीवित रहने से क्या लाभ?’ ॥ १९-२० ॥ ब्रह्माजी बोले — पिता का वचन सुनकर वह बुध नामक पुत्र क्रोधाविष्ट हो गया और उसने पिता के मुखपर चांटा मार दिया ॥ २१ ॥ उसने कहा — ‘ अरे नराधम ! कृमि-कीट आदि भी जिसमें मनुष्यों के समान ही सुख मानते हैं, उस रति-क्रीड़ाके समय तुमने मेरे सुख में बाधा क्यों पहुँचायी ? अथवा मेरे ऊपर अकस्मात् कौए की विष्ठा कैसे गिर पड़ी?’ – ऐसा कहकर उसने पुनः पिता पर लात से प्रहार किया और उसके प्राणों को हर लिया ॥ २२-२३ ॥ पिता के द्वारा प्राण त्याग दिये जाने पर वह ‘हर- ईश्वर’ ऐसा कहने लगा । [ अपनी इच्छापूर्ति में पिता को कण्टकरूप मानने के कारण] वह पुत्र प्रसन्न हो गया। पाँव में रस्सी बाँधकर उसने उसे दूर फेंक दिया ॥ २४ ॥ मदिरापान करके पुनः उसने उस वेश्या के साथ यथेच्छ रमण किया। प्रातः काल होने पर वह अपने घर गया और तब माता ने उसे देखा ॥ २५ ॥ उसने हर्षपूर्वक पुत्र को अपने हृदय से लगाया और स्नेहवश उसके स्तनों से दूध निकलने लगा। वह बोली — ‘तुम कहाँ चले गये थे, कहाँ ठहरे हुए थे, वहाँ तुमने क्या किया? हे वत्स ! यह सब तुम मुझे विस्तार से बतलाओ, तुम्हारे पिता अत्यन्त दुखी हैं। मैं भी निराहार और निर्जल होकर रातभर जागती रही हूँ ॥ २६-२७ ॥ हे वत्स! मैं यहाँ तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी और तुम्हारे पिता तुम्हें खोजने के लिये बहुत समय से गये हुए हैं, अब तुम अपने पिता को खोजने के लिये जाओ’ — ऐसा वह बार-बार कहने लगी। इसके द्वारा मुझे आज्ञा दी जा रही है – ऐसा समझकर वह पुत्र क्रुद्ध हो उठा और उसने एक सूखी लकड़ी से उसके सिर पर प्रहार किया, जिससे वह भूमि पर गिर पड़ी ॥ २८-२९ ॥ उसको चेतनाशून्य जानकर उसने उसके [भी] पाँव में रस्सी बाँधकर उसे घर से बाहर फेंक दिया और स्वयं वेश्या के घर में जाकर अत्यन्त प्रसन्न होकर काम- क्रीड़ा में निरत हो गया ॥ ३० ॥ सज्जन पुरुषों ने अपने-अपने घर से काष्ठ ले जाकर उस ब्राह्मण-दम्पती का दाह-संस्कार किया । दण्डनीय होने पर भी ब्राह्मण होने के कारण राजा ने उस द्विजाधम को दण्डित नहीं किया । पुनः घर में आये हुए उससे उसकी पत्नी धीरे-धीरे बोली ॥ ३११/२ ॥ सावित्री बोली — हे प्राणनाथ ! हे महामते ! मैं एक बात कहती हूँ, उसे आप सुनें ॥ ३२ ॥ आपका जन्म अत्यन्त प्रसिद्ध तथा अत्यन्त पवित्र ब्राह्मणकुल में हुआ है, किंतु आपका आचरण सर्वथा उसके विरुद्ध दिखायी देता है, अतः उस दुराचार का आपको विवेकपूर्वक परित्याग कर देना चाहिये ॥ ३३ ॥ इस लोकमें वही कार्य करना चाहिये, जिससे परलोक में सुख प्राप्त हो। [वृद्धावस्था से] पूर्व की अवस्था अर्थात् युवावस्था में ऐसा करना चाहिये, जिससे कि वृद्धावस्था में सुख प्राप्त हो ॥ ३४ ॥ [वर्षभर में] आठ मास तक वह कर्म करना चाहिये, जिससे कि वर्षाकाल में सुख प्राप्त हो और दिन में वही कार्य करना चाहिये, जिससे रात में सुख प्राप्त हो सके। पिता के प्रिय होने तथा ब्राह्मण होने के कारण राजा भी आपको क्षमा कर दे रहे हैं; सर्वांगसम्पूर्ण, अत्यन्त सुन्दर तथा आपके मन के अनुसार चलने वाली मुझ धर्मपत्नी को छोड़कर आप क्यों उस वेश्या में आसक्त हैं ? लोक में सर्वत्र आपकी निन्दा हो रही है, किंतु आपके भय से आपको कोई कुछ नहीं कहता ॥ ३५–३७ ॥ वे सभी लोग मुझसे कहते हैं, हे शुभे! तुम्हारा पति कैसा है? तब लज्जा के मारे मुँह नीचे करके मैं उसी क्षण अपना प्राण त्याग करना चाहती हूँ ॥ ३८ ॥ हे स्वामिन्! यदि आप अहर्निश मेरे साथ यथेष्ट रमण करें तो आपसे कोई कुछ भी नहीं कहेगा और आपको महान् पाप भी नहीं लगेगा ॥ ३९ ॥ यदि आप इसमें हित समझें तो विवेकपूर्वक उस वेश्या का परित्यागकर मेरे वचन का पालन करें। विद्वान् व्यक्ति को चाहिये कि वह अज्ञान में किये गये अथवा प्रमादवश किये गये कर्म का सर्वथा परित्याग कर दे ॥ ४० ॥ [मनुष्य को] निश्चय करना चाहिये कि यह जो [प्रिय अथवा अप्रिय परिणाम उपस्थित ] है, वह मेरे ही कर्म का परिणाम है। यदि मैंने अपना इष्टसाधन नहीं किया, तो मेरा अनिष्ट होना सर्वथा निश्चित है, इसलिये जो इष्ट न हो, वैसे परिणाम का जनक कार्य नहीं करना चाहिये ॥ ४१ ॥ इसके विपरीत कर्म करने पर पुरुष को न तो इस लोक में सुख मिलता है और न परलोक में ही। अपनी स्त्री के द्वारा कहे गये इस प्रकार के वचनरूपी बाणों से विद्ध हुए मर्मस्थलवाला महान् क्रूर वह बुध अत्यन्त रोष में भर गया और जलता हुआ-सा बोला ॥ ४२१/२ ॥ बुध बोला —अरी निर्लज्ज! निष्ठुर! प्रगल्भ ! दुष्टे! मुझपर स्पष्ट रूप से रुष्ट हुई तुम भी उसी गति को प्राप्त होओगी, जो गति मेरे माता-पिता की हुई है ॥ ४३१/२ ॥ सावित्री बोली — जिसने अनुकूल शिक्षा देने वाले तथा स्वतन्त्र अपने माता-पिता की मर्यादा का पालन नहीं किया, तो फिर विपरीत बोलने वाली मुझ स्त्री की रक्षा करने वाला वह कैसे हो सकता है ? पतिव्रता स्त्री के लिये तो पति के हाथों से मृत्यु प्राप्त करना भी इस लोक तथा परलोक में कल्याणकारक है ॥ ४४-४५ ॥ ऐसा कहती हुई उस अपनी पत्नी के बालों की चोटी को उसने सहसा पकड़ लिया और लकड़ी, ढेलों, मुट्ठियों तथा पत्थरों से वह उसे पीटने लगा ॥ ४६ ॥ उस स्त्री ने पूर्वजन्म के पुण्य के प्रभाव से पतिरूप में भगवान् श्रीराम का स्मरण किया और उसके द्वारा मर्मस्थानों में चोट किये जाने के कारण उसने सहसा प्राणों का परित्याग कर दिया। दिव्य देह धारणकर स्वर्ग में जाकर उसने परम सुख का उपभोग किया। इधर उसे मरा जानकर उसके पति ने रात्रि में उसके पैरों को खींचकर दूर ले जाकर फेंक दिया ॥ ४७-४८ ॥ तब निरंकुश हो अत्यन्त आनन्द में निमग्न हो, वह उस वेश्या के साथ रमण करने लगा। वह बुध उससे कहने लगा कि तुम्हारे लिये ही मैंने अपने माता-पिता और पत्नी सभी को मार डाला है ॥ ४९ ॥ तदनन्तर बहुत समय बीत जाने पर वह बुध कालभि नामक मुनि के घर गया। उस समय कालभिमुनि के स्नान के लिये गये हुए होने पर उस दुष्ट ने मुनि की भार्या के बालों को पकड़ लिया ॥ ५० ॥ उसने अत्यन्त रमणीय मुनिपत्नी के साथ कामुक चेष्टाएँ। कीं । तदनन्तर उस स्त्री ने उसे शाप दे दिया ॥ ५११/२ ॥ सुलभा बोली — मेरे माता-पिता ने मेरा यह ‘सुलभा’ दुष्ट नाम क्यों रखा ? हे दुष्टबुद्धि ! हे नराधम ! मैं तुम्हारे लिये सुलभ अर्थात् सरलता से प्राप्त हो गयी हूँ। मेरे पति कालभि नामक मुनिश्रेष्ठ जब स्नान करने गये हुए थे, तब तुमने मेरे साथ बलपूर्वक दुराचार किया, अतः जाओ, तुम कुष्ठरोग से ग्रस्त हो जाओगे, जन्मान्तर में कोई भी व्यक्ति कहीं भी तुम्हारा नामतक नहीं लेगा ॥ ५२-५४ ॥ ब्रह्माजी बोले — तब भयभीत हुआ वह बुध पुनः वेश्या के घर चला गया और वहाँ सुरापान करके कुछ भी चिन्ता न करते हुए उसने उसके साथ रमण किया। इस प्रकार के उसके दुष्कर्मों का मैं कैसे वर्णन करूँ; क्योंकि जो दूसरे के दोषों का बखान करता है, उसके पुण्य का क्षय हो जाता है ॥ ५५-५६ ॥ समय आने पर वह मृत्यु को प्राप्त हुआ और यमदूत उसको यमराज के यहाँ ले गये। यमराज ने (दूतों से) कहा — इसे यहाँ क्यों लाये हो, इसे सीधे नरक में ले जाओ। यमराज का वचन सुनकर दूत उसी समय उसे ले गये और प्रलयपर्यन्त के लिये उसे नरक में डाल दिया ॥ ५७-५८ ॥ नारकीय यातना भोग लेने के अनन्तर उसने वैश्य के घर में जन्म लिया और ऋषिपत्नी के शाप से वह महान् कुष्ठरोग से ग्रस्त हो गया ॥ ५९ ॥ जो पिता-माता, स्त्री का वध करने वाला है, सुरापान करने वाला है तथा गुरुपत्नी के साथ गमन करने वाला है, उसका स्पर्शमात्र हो जाने पर वस्त्रोंसहित स्नान करना चाहिये ॥ ६० ॥ ऐसे प्राणी का नाम भी नहीं लेना चाहिये; क्योंकि इससे महान् दोष होता है। इस प्रकार के इस पापात्मा को हम इधर छोड़ देंगे तो यह विमान ऊपर को उड़ चलेगा, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ६११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — उन देवदूतों का इस प्रकार का वचन सुनकर राजा शूरसेन अत्यन्त कम्पित हो उठे और उनसे बोले कि मुझे इसके दुष्कर्मों का ज्ञान नहीं था । तदनन्तर अत्यन्त व्याकुल हुए राजा शूरसेन ने पुनः उठकर उन देवदूतों को प्रणाम किया और उनसे कहा — ‘आप मेरे ऊपर कृपा करके इस पापी के सभी दोष- पापों को दूर करने का उपाय मुझे बतायें’ ॥ ६२–६४ ॥ दूत बोले — हे राजन्! हे नृपश्रेष्ठ! उठिये ! उठिये, हम इसके पापों के विनाश का उपाय बताते हैं, आप एकाग्रचित्त होकर उसका श्रवण करें ॥ ६५ ॥ गणेशजी का जो चार अक्षरवाला प्रसिद्ध नाम है, उसका आप इसके कान में जप करें, इससे सभी दोष-पापों का उसी प्रकार विनाश हो जायगा, जिस प्रकार कि भगवान् सूर्य के उदय हो जानेपर सम्पूर्ण अन्धकार विनष्ट हो जाता है। नाम-जप के अतिरिक्त किसी अन्य उपाय में इसका अधिकार नहीं है, अतः [यह ] नाम का ही जप [तथा श्रवण ] करे ॥ ६६-६७ ॥ ब्रह्माजी बोले — देवदूतों के कथनानुसार राजा शूरसेन ने ‘जय’ शब्द का उच्चारण करते हुए उस कुष्ठी वैश्य के कान में गणेशजी का जो चार अक्षरवाला नाम (गजानन) है, उसका तीन बार जप किया ॥ ६८ ॥ ‘गजानन’ इस नाममन्त्र को सुनते ही वह कुष्ठी दिव्य देहवाला हो गया। वह अपने तेज से उसी प्रकार सर्वत्र प्रकाश कर रहा था, जैसे कि भगवान् सूर्य अपने तेज से समस्त लोक को प्रकाशित करते हैं ॥ ६९ ॥ नाम के सुननेमात्र से ही सभी प्रकार के पापों के विनष्ट हो जाने पर वह सभी दिशाओं तथा देशों को प्रकाशित करते हुए विमान में आरूढ़ हो गया ॥ ७० ॥ तदनन्तर विघ्नराज गणेशजी की आज्ञा पाकर उनके दूतों ने सभी लोगों से समन्वित उस विमान को क्षणभर में ही गणेशजी धाम पहुँचा दिया ॥ ७१ ॥ हे निष्पाप! जो-जो आपने पूछा, वह सब मैंने बता दिया है। यह श्रेष्ठ संकष्टचतुर्थीव्रत अत्यन्त पुण्यप्रद, धर्म की प्राप्ति कराने वाला और यश तथा आयुष्य को प्रदान करने वाला है। इसके माहात्म्य का श्रवण सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त कराने वाला है । यह व्रत सभी पीड़ाओं को दूर करने वाला तथा सभी प्रकार के विघ्नों का विनाशक है। मैंने दूर्वा के माहात्म्य तथा गणेशजी के नाम का प्रभाव भी तुम्हें बतलाया, अब आगे और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ ७२-७३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘दूर्वा- नाममहिमावर्णन’ नामक छिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७६ ॥ Content is available only for registered users. 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