श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-119
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय
दैत्यराज सिन्धु का पराजित होकर चिन्ताग्रस्त होना, उसके दो पुत्रों धर्म तथा अधर्म का पिता को आश्वस्त करना तथा युद्ध के लिये आज्ञा माँगना, सेना लेकर दोनों का युद्धार्थ प्रस्थान, वीरभद्र, कार्तिकेय, हिरण्यगर्भ तथा भूतराज की सेनाओं का दैत्यसेना के साथ भीषण संग्राम, कार्तिकेय का धर्म एवं अधर्म का वध करना तथा सम्पूर्ण समाचार शिव-पार्वती को निवेदित करना
अथः एकोनविंशोत्तरशततमोऽध्यायः
धर्माधर्मवध

ब्रह्माजी बोले — कार्तिकेय के द्वारा पर्वत के प्रहार से महान् असुर कल को मारे जाने तथा वीरभद्र के द्वारा अपनी हथेली की मार से विकल को मार दिये जाने से — इस प्रकार अपने दोनों सालों कल तथा विकल, जो देवसेना का विनाश करने वाले थे, उनकी मृत्यु का समाचार सुनकर भद्रासन पर बैठा हुआ तथा अनेक वीरों से घिरा हुआ दैत्यराज सिन्धु महान् चिन्ता को प्राप्त हो गया । उस समय वह भगवान् शिव के पुत्र मयूरेश के विषय में सोचने लगा कि क्या यह देव मयूरेश इसी प्रकार से देवताओं के द्वेषी सभी असुरों का विनाश कर डालेगा? ॥ १-३ ॥

इस प्रकार चिन्ता करते-करते दैत्यराज सिन्धु को महान् मूर्च्छा छा गयी। उसी समय दैत्यराज सिन्धु के धर्म तथा अधर्म नामक दो पुत्र वहाँ आ पहुँचे, वे दोनों महान् बलशाली थे, वे भद्रासन पर बैठे हुए अपने पिता से इस प्रकार से कहने लगे — हे पिताजी ! पार्वती के उस छोटे-से बालक से आप क्यों भय खाते हैं ? ॥ ४-५ ॥ हे दैत्येन्द्र! आप हम दोनों को आज्ञा प्रदान करें, हम लोग क्षणभर में ही उसे मार डालेंगे। उसके समक्ष युद्ध करते हुए मृत्यु को प्राप्त हमारे दोनों वीर मामा-कल तथा विकल स्वर्ग को प्राप्त हो गये हैं ॥ ६ ॥ विविध वीरों से संरक्षित अनेक प्रकार की सेना का विनाश करके वे दोनों वीर कल तथा विकल अपने स्वामी का कार्य करते हुए महान् यश को प्राप्त करके तर गये हैं। हम दोनों भी युद्ध करेंगे और शत्रु को बलपूर्वक मारकर या तो वापस लौट आयेंगे अथवा अगर युद्ध में उस मयूरेश के द्वारा मारे जायँगे तो मोक्ष को प्राप्त करेंगे ॥ ७-८ ॥ हम दोनों जबतक जीवित हैं, तबतक आप कोई चिन्ता न करें। इस समय इन्द्र आदि देवता आपके कारागार में बन्द हैं, जब आपने उनपर विजय प्राप्त की, तब क्या आपके कोई पिता आदि आपके साथ थे, हम लोग आपके शत्रु का मस्तक काटकर आपके पास लायेंगे, इसमें कोई संशय नहीं है । अन्यथा लोक में हम कभी अपना मुख नहीं दिखलायेंगे ॥ ९-१०१/२

ब्रह्माजी बोले — उन दोनों पुत्रों धर्म तथा अधर्म का इस प्रकार का वचन सुनकर दैत्यराज सिन्धु को बड़ा ही हर्ष प्राप्त हुआ। वह उन दोनों से बोला — तुम दोनों युद्ध करो और उत्तम यश प्राप्त करो। उस भयानक शत्रु मयूरेश को मारकर तुम लोग शीघ्र ही मेरे पास चले आओ ॥ ११-१२ ॥

दैत्यराज के इस प्रकार के वचनों को सुनकर युद्ध की लालसा वाले वे दोनों धर्म तथा अधर्म पिता के चरणों में प्रणाम करके और माता का आशीर्वाद लेकर प्रत्येक दस-दस करोड़ की सेना के साथ शीघ्र ही निकल पड़े। वह चतुरंगिणी सेना रथ, घोड़े, हाथी और पैदल सैनिकों से समन्वित थी और वे सैनिक नाना प्रकार के शस्त्रों को धारण किये हुए थे ॥ १३-१४ ॥ [सबसे आगे] सिन्दूर लगाने से अरुणिम वर्ण के मस्तक वाले पैदल सैनिक प्रसन्नतापूर्वक जा रहे थे, उनके पीछे हाथी चल रहे थे, जो विविध प्रकार के पर्वतों के समान थे, नाना प्रकार की गैरिक आदि धातुओं से चित्रित थे तथा नाना प्रकार के ध्वजों से सुशोभित थे ॥ १५ ॥

तदनन्तर अपने हाथों में नाना प्रकार के शस्त्रों तथा खड्गों को धारण किये हुए अश्वारोही सैनिक अश्वों पर आरूढ़ होकर चल रहे थे। वे मेघ के समान गर्जना के द्वारा दसों दिशाओं को गुंजायमान कर रहे थे ॥ १६ ॥ उस सेना के मध्य में वे दोनों धर्म तथा अधर्म नामक भाई सुशोभित हो रहे थे। वे अनेक प्रकार के अलंकारों से अलंकृत थे और वे दोनों अनेकों आयुधों को धारण किये हुए थे। वे दोनों महाबली अपने कानों में रत्न तथा सुवर्ण से मण्डित कुण्डलों को धारण किये हुए थे तथा अत्यन्त तेजोमय मुकुटों से सुशोभित हो रहे थे । वे मोती तथा मणियों से बनी मालाओं को धारण किये हुए थे। इस प्रकार के वे दोनों युद्धोन्मत्त दैत्य विविध प्रकार के वाद्यों के घोष के साथ रणभूमि में पहुँचे ॥ १७–१९ ॥

वीरभद्र आदि ने उन दोनों दैत्यवीरों तथा उनकी सेना को भी देखा। उन दोनों को समीप में आया देखकर देव मयूरेश से प्रेरणा प्राप्तकर वीरभद्र, कार्तिकेय, क्रोधित हिरण्यगर्भ तथा विशाल नेत्रवाला भूतराज – ये चारों असंख्य सेना को साथ लेकर युद्धभूमि के लिये निकल पड़े ॥ २०–२११/२

तदनन्तर दोनों सेनाओं के सैनिकों के बीच भीषण युद्ध हुआ। दोनों पक्षों के वे वीर एक-दूसरे के सिर, पैर, बाहु, उदर एवं कन्धे पर वार कर रहे थे। धूल से सूर्य के आच्छादित हो जाने के कारण मरे हुए वीरों को पुनः मारा जा रहा था ॥ २२-२३ ॥ कुछ योद्धा चक्र छोड़ रहे थे तो कोई दूसरे भिन्दिपाल चला रहे थे । कुछ दूसरे बाणों की वर्षा कर रहे थे तो कुछ सैनिक विविध प्रकार के अस्त्रों के द्वारा युद्ध कर रहे थे । वहाँ पर सैनिक वीरों का आपस में मल्लयुद्ध होने लगा। इस प्रकार मयूरेश द्वारा रक्षित सेना का दैत्यसेना द्वारा संहार हुआ ॥ २४-२५ ॥ वहाँ जो सैनिक बच गये थे, वे विह्वल होकर दसों दिशाओं में भाग गये। यह देखकर षडानन कार्तिकेय अत्यन्त क्रुद्ध हुए, उस समय वे अपने बारह हाथों में धारण किये गये बारह आयुधों से सुशोभित हो रहे थे ॥ २६ ॥

उन आयुधों के द्वारा शीघ्र ही विनाश कर दिया। कुछ तदनन्तर उन्होंने दैत्यराज सिन्धु द्वारा रक्षित सेना का वीरों के बाहु कट गये थे। किन्हीं वीरों के बीच से दो टुकड़े हो गये थे। उस युद्ध में किसी के मस्तक कट गये थे, तो किसी सैनिक के पैर कट गये थे । इस प्रकार हाथी, घोड़े एवं रथों से भरी हुई वह सेना नाश को प्राप्त हो चुकी थी ॥ २७-२८ ॥ उनमें से कुछ वीरों ने स्वर्ग प्राप्त किया, कुछ ने षडानन के स्वरूप को प्राप्त किया। मारे जाते हुए जिन महान् बलशाली सैनिकों ने मयूरेश को देखते हुए अपने प्राणों को छोड़ा था, वे उनकी कृपा से उनके निजधाम को प्राप्त हुए। मयूरेश की कृपादृष्टि पड़ने पर उनके सभी जन्मों में किये गये पाप विनष्ट हो गये थे ॥ २९-३० ॥

कार्तिकेय के पुच्छयुक्त बाणों के द्वारा अपनी समस्त सेना को विनष्ट हुआ देखकर दैत्यराज सिन्धु के अधर्म एवं धर्म नामक दोनों वीर पुत्रों ने अस्त्रों, शस्त्रों तथा बाणसमूहों के द्वारा कार्तिकेय के साथ बहुत प्रकार से युद्ध किया । तदनन्तर कुछ ही क्षणों में उन दोनों ने कार्तिकेय के साथ मल्लयुद्ध किया ॥ ३१-३२ ॥ उन दोनों दैत्यों का इस प्रकार का बल-पराक्रम देखकर छः बाहुओं वाले उन महान् बलशाली कार्तिकेय ने अपने छहों हाथों से बलपूर्वक शीघ्र ही उन दैत्यों की चोटी को पकड़ लिया और अनेक बार घुमाते हुए भूमि पर पटक दिया। भूमि पर गिरने से उन दोनों के शरीर के सैकड़ों टुकड़े हो गये ॥ ३३-३४ ॥

भगवान् शिव के पुत्र द्वारा विजय प्राप्त कर लेने पर चारों ओर वाद्य बजने लगे। सभी सैनिक ‘हे मयूरेश ! तुम्हारी जय हो’ इस प्रकार से कहने लगे ॥ ३५ ॥

तदनन्तर कार्तिकेय, वीरभद्र, भूतराज तथा हिरण्यगर्भ – ये चारों अपने स्वामी मयूरेश के पास गये। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मयूरेश का आलिंगन किया और वे आपस में वार्तालाप करने लगे ॥ ३६ ॥ वे चारों पुनर्जन्म प्राप्त करने के समान परस्पर आनन्दित हो उठे । उन्होंने युद्ध-सम्बन्धी सम्पूर्ण वृत्तान्त भगवान् शिव तथा माता पार्वती को निवेदित किया और बताया कि दैत्यराज सिन्धु की समस्त सेना मारी जा चुकी है और दैत्य सिन्धु के दोनों बलवान् पुत्र-धर्म तथा अधर्म भी मारे जा चुके हैं ॥ ३७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘धर्म, अधर्म और असुरसेना के संहार का वर्णन’ नामक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११९ ॥

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