December 7, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-155 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ पचपनवाँ अध्याय गणेशपुराणीय माहात्म्य-निरूपण के प्रसंग में विविध इतिहास एवं ग्रन्थ की फलश्रुति अथः पञ्चपञ्चाशदुत्तरशततमोऽध्यायः फलश्रुति निरूपणं सूतजी बोले — हे द्विजो ! इस पुराण का एक बार भी श्रवण करने से जन्म-मरणरूप बन्धन से मुक्ति मिल जाती है। यदि इसे अनेक बार सुना जाय तो उस फल को बता पाने में शेषनाग अथवा ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं। सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्रतीर्थ में ब्राह्मणों को भक्तिभाव से सहस्र भार सुवर्ण देकर मनुष्य जिस पुण्यफल को प्राप्त करता है, वही पुण्यफल उस भक्तिसम्पन्न मनुष्य को इस पुराण के श्रवण से प्राप्त हो जाता है ॥ १–३ ॥ ब्रह्माजी ने सांगोपांग रीति से अनुष्ठित और [प्रचुर] दक्षिणा वाले समस्त यज्ञ-यागादि के पुण्यफल की पुराणश्रवण के पुण्यफल से तुलना की, जिसमें गणेशपुराण के श्रवण का जो पुण्यफल था, वह यज्ञफल की अपेक्षा अधिक गौरवपूर्ण सिद्ध हुआ। [ जब सांगोपांग अनुष्ठान किये गये यज्ञों के पुण्यफल की ऐसी दशा है, तो] वहाँ पर सभी प्रकार के दान-व्रत आदि पुण्यकर्मों के फल की गणना की बात ही क्या हो सकती है ! ॥ ४-५ ॥ करोड़ों कन्यादान तथा हजारों गोदान करने का जो पुण्यफल है, उससे कोटिगुणित अधिक पुण्यफल इस पुराण के श्रवण से प्राप्त होता है । अंगोंसहित चारों वेदों के स्वाध्याय-आवर्तनादि का, निरन्तर शास्त्रों के निरूपण- चिन्तनादि में तत्पर रहने का और सत्पुरुषों की सेवा का जो पुण्यफल है, उससे करोड़ गुना अधिक पुण्यफल इस पुराण को सुनने से मिल जाता है ॥ ६–७१/२ ॥ महाभारत तथा समस्त पुराणों के श्रवण का जो फल होता है, उससे करोड़ गुना अधिक पुण्यफल गणेशपुराण के श्रवण से मिलता है। जिसके भवन में लिखकर गणेशपुराण स्थापित किया जाता है, वहाँ पर राक्षस, भूत, प्रेत, पूतना आदि बालग्रह तथा अन्य ग्रह कभी भी पीड़ा नहीं पहुँचाते। उस घर की गणेशजी सर्वदा रक्षा करते रहते हैं ॥ ८–१०१/२ ॥ जो मनुष्य एकाग्र चित्त से इस पुराण का श्रवण अथवा पूजन करता है, उसके दर्शन से तो पतित जन भी पवित्र हो जाते हैं और वह ब्रह्मा आदि देवताओं तथा मुनिजनों का भी आदरणीय हो जाता है ॥ ११-१२ ॥ वह क्रुद्ध हो जाय तो पूरे विश्व को भस्म कर सकता है और सन्तुष्ट हो जाय तो इन्द्रपद प्रदान करने में समर्थ है। इस पुराण का नित्यप्रति श्रवण करने से [ अणिमा आदि] आठ सिद्धियों को मनुष्य प्राप्त कर लेता है ॥ १३ ॥ [गणेशपुराण का श्रवण करने वाला] मनुष्य कभी दरिद्रता और भीषण कष्ट से पीड़ित नहीं होता। वह पद्म आदि निधियों तथा अपने किसी भी वांछित को प्राप्त करने में समर्थ होता है ॥ १४ ॥ कल्पवृक्ष, कामधेनु, चिन्तामणि तथा [कुबेर की] निधि- ये सभी उसके वश में हो जाते हैं और वह [सबका] वन्दनीय हो जाता है ॥ १५ ॥ मारण, मोहन, उच्चाटन, स्तम्भन आदि आभिचारिक क्रियाएँ गणेशपुराण के स्मरणमात्र से क्षणभर में निष्फल हो जाती हैं। गणेशजी के [ श्रीविग्रह के] समीप में स्थित होकर जो मनुष्य इस पुराण का श्रवण करता है, वह [ब्रह्महत्या आदि] महापापों तथा स्त्री – बालकादि की हत्या-जैसे अन्य पापों से मुक्त हो जाता है। उसे देहावसान के उपरान्त निस्सन्देह गणेशजी का सान्निध्य सुलभ होता है ॥ १६-१७१/२ ॥ [प्रधान श्रोता के रूप में] ब्राह्मण को बीच में बैठाकर [तथा स्वयं उसका अनुगत होकर ] यदि शूद्र भी इसका श्रवण करता है, तो वह [ जन्मान्तर में] क्रमानुरूप वैश्यत्व तथा क्षत्रियत्व प्राप्त करके अन्त में ब्राह्मणत्व पा लेता है। जिसने नित्य और नैमित्तिक कर्मों का लोप किया है, ऐसा व्यक्ति भी यदि इस पुराण का श्रवण करे तो गणेशजी के अनुग्रह से [कर्मलोपजन्य प्रत्यवाय से मुक्ति और ] उनका समग्र फल प्राप्त कर लेता है ॥ १८-१९१/२ ॥ भाद्रपदमास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को जो मनुष्य गणपति की मृन्मयी मूर्ति बनाकर तोरणादि से शोभायमान मण्डप में उसे प्रतिष्ठित करके आदरपूर्वक पूजन करता है और गणेशपुराण का श्रवण करता है, उसपर विघ्नेश्वर विनायकदेव उसी क्षण प्रसन्न हो जाते हैं और समस्त वांछितों की पूर्ति कर अन्त में उसे मोक्ष भी प्रदान करते हैं ॥ २०-२११/२ ॥ इस पुराण में जितने भी स्तोत्र विद्यमान हैं, उन सभी का जो मनुष्य भक्तिभाव से प्रतिदिन पारायण करता है, निस्सन्देह उसे सिद्धि प्राप्त होती है। उसके लिये जो भी अभीष्ट असाध्य होता है, उसे वह [ गणेशपुराणीय ] स्तुतियों के पाठ से उपलब्ध कर लेता है ॥ २२-२३ ॥ जो मनुष्य [स्तोत्रों के पुरश्चरण की] पद्धति से मासर्पयन्त इनका जपानुष्ठान करता है तथा अनुष्ठान की समाप्ति पर भक्तिभाव से ब्राह्मणों को भोजन कराता है, वह गणपति के सारूप्य को प्राप्त करता है ॥ २४ ॥ ऋषियों ने कहा — हे निष्पाप सूतनन्दन! हे महाभाग ! प्राचीन समय में इस पुराण का श्रवण करके किसे और किस प्रकार पुण्यफल की प्राप्ति हुई थी, उसे हम जानना चाहते हैं, अतः बतलाइये ॥ २५ ॥ सूतजी बोले — हे मुनियो ! आप लोग श्रवण कीजिये । पूर्वकाल में [बोल पाने में असमर्थ] कोई मूक नाम के मुनि थे। वे [ एक बार ] ब्रह्मलोक गये और उसी समय स्वेच्छावश विचरण करते हुए महर्षि लोमश भी अकस्मात् वहाँ जा पहुँचे। उन दोनों ने लोकेश्वर ब्रह्माजी को नमस्कार किया और उनकी आज्ञा पाकर बैठ गये । ब्रह्माजी ने उनका स्वागत-सत्कार किया। तब परम भक्ति- भाव से महर्षि लोमश ने ब्रह्माजी से कहा — ॥ २६-२७ ॥ लोमशजी बोले — हे देव ! हे महाभाग ! आपने व्यासजी को पुण्यों की वृद्धि करने वाला गणेशपुराण सुनाया था, उसे आप हमें भी सुनाइये ॥ २८ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे लोमश ! यह मंगलमय गणेशपुराण समस्त पापों का हरण करने वाला तथा मनुष्यों को भोग और मोक्ष देने वाला है। आप इसका यत्नपूर्वक श्रवण कीजिये ॥ २९ ॥ सूतजी बोले — तब ब्रह्माजी ने अपने प्रवचन के द्वारा महर्षि लोमश को भोग- मोक्षप्रद गणेशपुराण का उपदेश किया। [उसी समय ] शास्त्रीय सिद्धान्तों के रसिक महर्षि मूक ने भी भक्तिपूर्वक उस पुराण का सम्पूर्ण रूप से श्रवण किया। तभी से मुनिवर मूक बृहस्पति के समान भाषणकुशल हो गये ॥ ३०-३१ ॥ उन्होंने गणेशपुराण का पारायण एवं स्वाध्याय करके उसे दूसरे लोगों को भी सुनाया तथा नानाविध वांछित भोगों को भोगकर और पुत्र-पौत्रादिरूप वंशपरम्परा का विस्तारकर वे अन्त में भगवान् गणपति के मंगलमय परम धाम को प्राप्त हुए ॥ ३२१/२ ॥ हे मुनियो ! अब एक अन्य प्राचीन इतिहास का श्रवण कीजिये। इक्ष्वाकुवंश में संवरण नाम के एक परम धार्मिक राजा हुए थे। वे यज्ञकर्ता, दाता, पवित्र, लोकरक्षक, स्वाध्यायनिरत, शत्रुहन्ता तथा प्रजापालन में तत्पर थे। वे सभी धर्मों का प्रतिपादन करने में समर्थ, प्रजा की आय का छठा भाग ही ग्रहण करने वाले, लोकपूजित और [सबको] परमप्रिय थे। उनकी ख्याति तीनों लोकों में फैली थी ॥ ३३-३५१/२ ॥ महाराज संवरण सन्तानहीन थे, इसलिये उन्होंने पुत्रेष्टि नामक याग का आरम्भ किया। संवरण ने यद्यपि दक्षिणा एवं अन्नदान से समन्वित पुत्रेष्टि का सांगोपांग सम्पादन किया था, तथापि उन्हें सन्तानप्राप्ति नहीं हुई, तब उन्होंने हरिवंशपुराण का श्रवण किया और ब्राह्मणों की पूजा करने के बाद कथावाचक को भी वस्त्र, धेनु, सुवर्ण, रत्न, मूल, फल आदि के द्वारा सन्तुष्ट किया ॥ ३६-३८ ॥ इतना करने पर भी उन्हें पुत्रप्राप्ति न हो सकी। [इसके कुछ दिन बाद] दैवयोग से उनके भवन में मूकमुनि का आगमन हुआ, जो कि गणेशपुराण के मर्मज्ञ के रूप में प्रसिद्ध थे ॥ ३९ ॥ राजा संवरण ने प्रार्थना करके उनको अपने यहाँ रोक लिया और बड़ी प्रसन्नता के साथ उनके मुख से गणेशपुराण का श्रवण किया । पुराणश्रवण के बाद राजा ने उन द्विजश्रेष्ठ मूक को रत्न, मुक्ताफल, वस्त्र तथा स्वर्णालंकारादि समर्पित करके प्रसन्न किया। इसके [कुछ काल] बाद राजा को पुत्र की प्राप्ति हुई और वे गणेशजी की भक्ति में तत्पर हो गये। उन्होंने अनेक सुखों को भोगने के पश्चात् गणपतिदेव के परमधाम को प्राप्त किया ॥ ४०-४२ ॥ राजा संवरण की एक वन्ध्या बहन थी, वह तीस वर्ष की तरुण-अवस्था को प्राप्त करके भी रजोधर्म से रहित थी। उसने जब सुना कि ‘यथोचित समय आने पर राजा को सन्तानप्राप्ति हुई है और वह सन्ततिलाभ गणेशपुराण के श्रवण का परिणाम है’ तो उसने मूक मुनि को बुलाया और उनके मुख से मंगलमय गणेशपुराण का श्रवण किया। गणेशजी की भक्ति में निरत उस महिला ने भी परम शूर पुत्र को प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त और भी बहुत-से पुत्र-पौत्रों को प्राप्तकर तथा मनोहर भोगों को भोगने के पश्चात् उसका देहावसान हुआ और उसने गणपति के परमधाम को पा लिया ॥ ४३-४५१/२ ॥ प्राचीनकाल की बात है। राजा सगर के पुत्रों में एक पुत्र पंगु था। उसने विनयपूर्वक भक्तिभाव से बारह वर्षों तक महर्षि लोमश से इस पवित्र पुराण का श्रवण किया तथा बड़ी भक्ति से लोमशजी को [नानाविध] द्रव्य समर्पित करके सन्तुष्ट किया। इससे उसके चरण स्वस्थ हो गये और उसने विजय, पुष्टि तथा दीर्घायुष्य के साथ-साथ अन्त में गणपतिदेव के उस परमधाम को भी प्राप्त कर लिया ॥ ४६-४८ ॥ अठारह पुराणों का श्रवण करने से जो पुण्यफल प्राप्त होता है, वही पुण्यफल एकमात्र गणेशपुराण को सुनने से भी मिल जाता है। हे विप्रो ! काकवन्ध्या नारी इसका श्रवण करके बहुत-से पुत्रों को प्राप्त करती है और जिस स्त्री का बार-बार गर्भपात होता है, वह स्थिर गर्भवाली हो जाती है ॥ ४९-५० ॥ हे मुनिवरो ! इसका श्रवण करके गूँगा व्यक्ति बृहस्पति के सदृश भाषणकुशल हो जाता है और वेदाभ्यासी श्रेष्ठ ब्राह्मण निस्सन्देह सर्वमान्य और सर्वज्ञ बन जाता है ॥ ५१ ॥ गणेशपुराण का [सतत] स्मरण-चिन्तन करते रहने से शूद्र वैश्यत्व, वैश्य क्षत्रियत्व तथा क्षत्रिय ब्राह्मणत्वरूप वर्णोत्कर्ष को प्राप्त कर लेता है ॥ ५२ ॥ इस पुराण के एक अध्याय का भी श्रवण करने से कुमारी कन्या गुणवान्, कुलीन, समृद्ध और सदाचारी पति को प्राप्त कर लेती है और जन्मान्ध मनुष्य पुराण के श्रवण से देखने की शक्ति पा लेता है। जो मनुष्य समस्त तीर्थों में स्नान करता है और सब प्रकार के दान देता है, उसे जिस फल की प्राप्ति होती है, वही फल इस पुराण को भक्तिभाव से सुनने वाला पा लेता है ॥ ५३-५४१/२ ॥ जो मनुष्य अनेक वर्षों तक ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि- साधन (चारों ओर अग्नि और ऊपर सूर्य के आतप का सेवन करते हुए तपश्चरण), हेमन्त ऋतु में जलवासन (कण्ठ या नाभिपर्यन्त जल में स्थित रहना) और वर्षा – ऋतु में आकाशवास (खुले आकाश के नीचे रहकर वृष्टि का सहन) करता है, उसको मिलने वाला फल गणेशपुराण के पाँच अध्यायों को सुनने मात्र से मिल जाता है। जो मनुष्य भक्तिभाव से सर्वदा (यावज्जीवन) अग्निहोत्र का अनुष्ठान करता है, उसे प्राप्त होने वाला फल इस पुराण का श्रवण करने मात्र से मिल जाता है ॥ ५५-५७ ॥ हे द्विजो ! जो मनुष्य दस हजार वर्षों तक अपने पैर के एक अँगूठे के सहारे खड़ा रहकर तपस्या करता है, उसको जैसा फल मिलता है, वैसा ही पुण्यफल इस पुराण के दस अध्यायों को भक्तिभाव से सुनने मात्र से निश्चय ही प्राप्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५८१/२ ॥ जो मनुष्य यावज्जीवन इस लोक में नित्यप्रति गणेशपुराण का श्रवण करता है, वह चक्रवर्ती सम्राट् होता है। जो मनुष्य जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त काशीवास करता है, उसे [काशीवास से] मिलने वाला पुण्यफल गणेशपुराण के श्रवण से प्राप्त हो जाता है ॥ ५९-६०१/२ ॥ जो मनुष्य एक हजार माघ मासों तक प्रयाग में स्नान करता है, उससे मिलने वाला जो पुण्यफल है, वही फल उसको गणेशपुराण का श्रवण करने से प्राप्त हो जाता है ॥ ६११/२ ॥ मथुरापुरी, हरिद्वार, बदरिकाश्रम, सेतुबन्धतीर्थ, कुरुक्षेत्र और श्रीशैलक्षेत्र – इनमें [तपस्या करने का] जो फल होता है, उससे कोटिगुना अधिक फल मनुष्यों को सर्वदा [इस पुराण के श्रवण से] मिल जाता है ॥ ६२-६३ ॥ वैसे ही गोमतीनदी के संगम में जो मनुष्य भक्तिपूर्वक स्नान करता है, उससे मिलने वाले पुण्यफल से कोटिगुना अधिक फल इस पुराण का श्रवण करने से वह प्राप्त कर लेता है ॥ ६४ ॥ जो भक्तिमान् मनुष्य इस गणेशपुराण का श्रवण करता है, उसे न [भगवान् शंकर के ] त्रिशूल से, न [देवराज इन्द्र के] वज्र से और न चक्रधर भगवान् नारायण के सुदर्शन चक्र से ही भय रह जाता है ॥ ६५ ॥ हे मुनीश्वरो ! मैंने आप लोगों के समक्ष इस पुराण का विस्तारपूर्वक समग्र वर्णन किया है। इसके सम्पूर्ण माहात्म्य को तो ब्रह्मा, कार्तिकेय अथवा शेषनाग भी करोड़ों वर्षों में बतलाने में समर्थ नहीं हो सकते ॥ ६६ ॥ आप लोगों ने जो पूछा है, वह सभी पापों का नाशक, सभी अभीष्टों को देने वाला, भोग-मोक्षप्रद तथा पुण्यों की वृद्धि करने वाला है । नानाविध लीलाएँ करने वाले परमेश्वर गणपति का यह पुराण वक्ता और श्रोता को निष्पाप बनाने वाला है। [इसे मैं आप लोगों को सुना चुका हूँ], अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ? ॥ ६७-६८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘फलश्रुतिनिरूपण’ नामक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण क्रीडाखण्ड पूर्ण हुआ ॥ ॥ गणेशपुराण सम्पूर्ण ॥ Content is available only for registered users. 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