January 25, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -067 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ सड़सठवाँ अध्याय राजर्षि ययाति का आख्यान तथा ययाति गाथा श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सप्तषष्टितमोऽध्यायः सोमवंशे ययाति चरितं ययाति बोले — श्रेष्ठ ब्राह्मण तथा सभी वर्ण के लोग मेरा वचन सुनें — ‘मैं ज्येष्ठ पुत्र को कभी भी राज्य नहीं दूँगा । ज्येष्ठ पुत्र यदु ने मेरी आज्ञा का पालन नहीं किया है। जो [पिता के प्रति ] विपरीत बुद्धि वाला हो, वह सज्जनों के द्वारा पुत्र नहीं माना गया है। सज्जन लोग माता-पिता के वचन को मानने वाले पुत्र की ही प्रशंसा करते हैं। [वास्तव में] वही पुत्र है, जो माता-पिता के साथ पुत्रभाव में स्थित होकर व्यवहार करता है। यदु ने मेरी अवज्ञा की है; उसी प्रकार तुर्वसु, द्रुह्य तथा अनु ने भी मेरी बहुत अवहेलना की है। पुरु ने मेरे वचन का पालन किया है और विशेषरूप से मेरा सम्मान किया है । मेरा छोटा पुत्र [पुरु] ही मेरा उत्तराधिकारी है, जिसने मेरे बुढ़ापे को स्वीकार किया। शुक्राचार्य ने देवयानी के लिये मुझे जरावस्था प्राप्त होने की आज्ञा दी थी। जब मैंने उनसे प्रार्थना की, तब उन्होंने पुनः बुढ़ापे को संचारिणी बना दिया। काव्य तथा उशना नामधारी शुक्र ने स्वयं मुझे वर प्रदान किया था कि जो पुत्र आपके अनुकूल व्यवहार करे, वही आपके राज्य का अधिकारी होगा। अतः [ हे ब्राह्मणो !] अब आप लोग भी मुझे आज्ञा दें कि यह पुरु राज्य पर अभिषिक्त किया जाय’ ॥ १–७/१/२ ॥ प्रजागण बोले — जो पुत्र गुणसम्पन्न, सर्वदा माता-पिता का हित करने वाला तथा समस्त कल्याण के योग्य हो, वह छोटा होने पर भी [राज्य का] उत्तराधिकारी होता है। अतः पुत्र पुरु ही राज्य के योग्य है, जिसने आपके वचन का पालन किया है; शुक्र के वरदान से विपरीत [कार्य] नहीं किया जा सकता है ॥ ८-९१/२ ॥ सूतजी बोले — इस प्रकार जब प्रसन्न हुए नगरवासियों ने नहुषपुत्र [ययाति]-से कहा, तब उन्होंने अपने पुत्र पुरु को राज्य पर अभिषिक्त करके तुर्वसु को दक्षिण-पूर्व दिशा में रहने की आज्ञा प्रदान की। उसके बाद राजा [ययाति]-ने ज्येष्ठ पुत्र यदु को दक्षिण दिशा में नियोजित कर दिया और उन दोनों द्रुह्य तथा अनु को [क्रमश: ] पश्चिम तथा उत्तर दिशा में नियुक्त कर दिया। नहुषपुत्र ययाति ने सात द्वीपों वाली सागरों सहित पृथ्वी को जीतकर पुत्रों में राज्य को तीन भागों में बाँट दिया। इस प्रकार पुत्रों में राज्य संक्रमित करने वाले तथा हर्षपूर्ण मन वाले राजा बन्धुओं पर उनका भार सौंपकर प्रसन्न हो गये ॥ १०-१४ ॥ महाराज ययाति के द्वारा इस विषय में पहले ये गाथाएँ गायी गयी थीं, जिनके द्वारा मनुष्य जिस प्रकार कछुआ अपने सभी अंगों को समेट लेता है, वैसे ही अपनी समस्त कामनाओं को समेट लेता है और उन्हीं से वह श्रीमान् हो जाता है, अन्यथा नहीं; चाहे वह करोड़ों कर्म करने वाला ही क्यों न हो। कामनाओं के उपभोग से इच्छा शान्त नहीं होती है; जैसे हवि के द्वारा अग्नि बढ़ती है, उसी प्रकार यह निरन्तर बढ़ती ही जाती है । पृथ्वी पर जो भी व्रीहि, जौ, सोना, पशु तथा स्त्रियाँ हैं, वे सब वस्तुएँ [किसी] एक के लिये भी पर्याप्त नहीं हैं — यह मानकर [ मनुष्य को ] कामनामुक्त हो जाना चाहिये। जब मनुष्य सभी प्राणियों के प्रति मन, वचन तथा कर्म से पापमय भाव नहीं रखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है। जब वह दूसरे से डरता नहीं, दूसरे लोग भी उससे नहीं डरते; जब वह [दूसरे की] निन्दा नहीं करता तथा उससे द्वेष नहीं करता, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है। जो तृष्णा दुष्ट बुद्धि वालों के द्वारा बड़ी कठिनाई से त्यागने योग्य है, जो [ मनुष्य के] जीर्ण होने पर भी [स्वयं] जीर्ण नहीं होती तथा जो प्राण का अन्त करने वाला रोग है; उस तृष्णा का त्याग कर देने वाले को सुख होता है। जीर्ण व्यक्ति के केश जीर्ण हो जाते हैं, जीर्ण व्यक्ति के दाँत जीर्ण हो जाते हैं और उसके नेत्र तथा कान भी जीर्ण हो जाते हैं; केवल तृष्णा ही [ सदा ] उपद्रवविहीन रहती है अर्थात् यह सदा तरुण बनी रहती है । सभी प्राणी स्वभावत: ही जीर्ण होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है, किंतु [ मनुष्य के] जीर्ण हो जाने पर भी जीवन की आशा एवं धन की आशा जीर्ण नहीं होती है। संसार में जो कामसुख है तथा जो स्वर्ग का महान् सुख है, वह तृष्णा के नाश के सुख की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं है ॥ १५–२३ १/२ ॥ ऐसा कहकर वे राजर्षि [ ययाति] पत्नी के साथ वन में चले गये। उन महायशस्वी ने वहीं भृगुतुंग शिखर पर निराहार रहकर [ महान् ] तपस्या करके भार्यासहित स्वर्ग को प्राप्त किया। उनके ये पवित्र तथा देवर्षियों द्वारा सत्कृत पाँच वंश हैं, जिनके द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी उसी प्रकार व्याप्त है, जैसे वह सूर्य की रश्मियों से व्याप्त है। ययाति के पुण्यप्रद चरित्र को पढ़ने तथा सुनने वाला मनुष्य धनी, सन्तानयुक्त, आयुष्मान्, कीर्तिशाली एवं बुद्धिमान् हो जाता है और सभी पापों से मुक्त होकर शिवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ २४- २८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘सोमवंश में ययातिचरित’ नामक सड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६७ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe