श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -001
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
पहला अध्याय
देवर्षि नारदजी का नैमिषारण्य-आगमन, श्रीसूत-शौनक-संवाद में लिङ्गमहापुराण का उपक्रम
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे प्रथमोऽध्यायः
लिङ्गोद्भवप्रतिज्ञावर्णनं

॥ श्रीगणेशजी को नमस्कार है ॥
॥ भगवान् शिव को नमस्कार है ॥

नमो रुद्राय हरये ब्रह्मणे परमात्मने ।
प्रधानपुरुषेशाय सर्गस्थित्यन्तकारिणे ॥ १ ॥

जगत् की उत्पत्ति, स्थिति एवं अन्त के कारणीभूत [कारक] ब्रह्मा-विष्णु-शिवरूपात्मक प्रधान – पुरुषाधीश परमात्मा सदाशिव को नमस्कार है ॥ १ ॥

मुनि नारद शैलेश, संगमेश्वर, हिरण्यगर्भ, स्वर्लीन, अविमुक्त, महालय, रौद्र, गोप्रेक्षक, श्रेष्ठ पाशुपत, विघ्नेश्वर, केदार, गोमायुकेश्वर, हिरण्यगर्भ, चन्द्रेश, ईशान्य, त्रिविष्टप तथा शुक्रेश्वर आदि तीर्थस्थानों में भगवान् शंकर की यथोचित आराधना करके नैमिषारण्य पहुँचे ॥ २–४ ॥ नारदजी को देखकर नैमिषारण्य [^1] में निवास करने वाले ऋषियों के मन में अतीव प्रसन्नता हुई। उन्होंने नारदजी की सम्यक् प्रकार से पूजा करके उनके लिये उचित आसन प्रदान किया ॥ ५ ॥ उन नारदजी ने भी मुनियों के द्वारा प्रदत्त उस आसन को सहर्ष स्वीकार किया और उन मुनियों से भलीभाँति पूजित होकर तथा उस उत्तम आसन पर सुखपूर्वक विराजमान होकर वे लिङ्गमाहात्म्य से सम्बद्ध विचित्र रहस्यों वाली कथा सुनाने लगे ॥ ६१/२

इसी समय पुराणों के ज्ञाता परम बुद्धिमान् सूतजी तपस्वी मुनियों को प्रणाम करने की कामना से नैमिषारण्य तीर्थ में पधारे। नैमिषारण्यवासी ऋषियों ने व्यासजी के शिष्य उन सूतजी की सम्यक् प्रकार से स्तुति तथा पूजा की ॥ ७-८१/२

तत्पश्चात् अपनी कथाओं से रोमांचित कर देने वाले सूतजी को अतिविश्वस्त विद्वान् जानकर उन मुनियों की उनसे पुराण सुनने की इच्छा हो गयी ॥ ९१/२

तब सभी तपस्वी ऋषियों ने मुनिवर सूतजी से लिङ्गमाहात्म्य से युक्त पुण्यदायिनी पुराणसंहिता के विषय में पूछा ॥ १०१/२

नैमिषारण्यवासी ऋषि बोले महान् बुद्धिवाले हे सूतजी ! पुराणों का ज्ञान प्राप्त करने के लिये आपने श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी की उपासना की तथा उनसे पुराण संहिता प्राप्त भी की है ॥ १११/२

अतएव पौराणिकों में उत्तम हे सूतजी ! लिङ्ग- माहात्म्य से युक्त दिव्य पुराणसंहिता (लिङ्गपुराण ) – के विषय में हम आपसे पूछ रहे हैं ॥ १२१/२

ब्रह्मा के पुत्र श्रीमान् मुनिश्रेष्ठ नारदजी भी परमेश्वर रुद्रदेव के पावन क्षेत्रों में जाकर वहाँ उनके लिङ्गों की पूजा- अर्चना सम्पन्न करके अब यहाँ विराजमान ॥ १३-१४ ॥ शिवभक्त, आप, हम मुनिगण तथा नारदजी यहाँ उपस्थित हैं। इन मुनि के आगे आप पवित्र लिङ्गपुराण की कथा कहने में समर्थ हैं। आपने सब कुछ सफलतापूर्वक सिद्ध कर लिया है। आपको तो सब कुछ विदित होगा ॥ १५१/२

मुनियों के इस प्रकार कहने पर पौराणिकों में श्रेष्ठ सूतजी का मन प्रसन्नता से प्रफुल्लित हो गया । सर्वप्रथम ब्रह्माजी पुत्र देवर्षि नारद तथा नैमिषारण्यवासी मुनियों का अभिवादन करके बुद्धिमान् तथा पुण्यात्मा सूतजी ने लिङ्गपुराण कहना आरम्भ किया ॥ १६-१७ ॥

सूतजी बोले शिव, ब्रह्मा, विष्णु तथा मुनीश्वर व्यासजी को नमस्कार करके लिङ्गपुराण की कथा कहने के लिये मैं इस पुराण में प्रतिपादित विषय का स्मरण करता हूँ ॥ १८ ॥ शब्दब्रह्म ही इसका शरीर है यह साक्षात् शब्दब्रह्म (स्वस्वरूप ) – का प्रकाशक है। अकारादि- क्षकारान्त वर्ण ही इसके अवयव हैं, अनेक रूपों में स्थित होने पर भी यह अव्यक्त है, परात्पर, सूक्ष्मातिसूक्ष्म होने पर यह अकार, उकार तथा मकारात्मक स्थूल शरीर वाला है, ऐसे स्वयं प्रकाश्य शब्दब्रह्म ॐकार का ऋग्वेद मुख है, सामवेद इसकी जिह्वा है, यजुर्वेद इसकी महाग्रीवा है तथा अथर्ववेद इसका हृदय है, यह व्यापक है, यह प्रकृति तथा पुरुष से अतीत एवं प्रलय तथा उत्पत्ति से रहित है ॥ १९-२१ ॥

जो तमोगुण से युक्त होने पर कालरुद्र, रजोगुण से युक्त होने पर हिरण्यगर्भस्वरूप, सत्त्वगुण से आविष्ट होने पर सर्वव्यापी विष्णुरूप तथा गुणों से रहित होने पर महेश्वरस्वरूप में प्रकट होता है ॥ २२ ॥ प्रकृत्याश्रित होकर जो महत्, अहंकार तथा पंच- तन्मात्रात्मक (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध )  — सात रूपों में, तदनन्तर दस इन्द्रियों, पाँच महाभूतों तथा मन इत्यादि षोडश रूपों में, पुनः इन षोडश रूपों और अव्यक्त, ध्याता (जीव) एवं ध्येय (शिव) इत्यादि को लेकर छब्बीस रूपों में व्यक्त होते हैं, जो पितामह ब्रह्मा के भी पिता हैं, उन सृष्टि – पालन तथा संहाररूप लीला के लिये लिङ्गस्वरूप धारण करने वाले महेश्वर शिव को प्रणाम करके शुभकारक लिङ्गोद्भव की कथा से युक्त लिङ्गपुराण का मैं यथोचितरूप से वर्णन करूँगा ॥ २३-२४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘लिङ्गोद्भवप्रतिज्ञावर्णन’ नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥

[^1]: नैमिषारण्य लखनऊ से ८० किमी दूर लखनऊ क्षेत्र के अर्न्तगत सीतापुर जिला में गोमती नदी के बाएँ तट पर स्थित एक प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ है। मार्कण्डेय पुराण में अनेक बार इसका उल्लेख ८८००० ऋषियों की तपःस्थली के रूप में आया है। वायु पुराणान्तर्गत माघ माहात्म्य तथा बृहद्धर्मपुराण, पूर्व-भाग के अनुसार इसके किसी गुप्त स्थल में आज भी ऋषियों का स्वाध्यायानुष्ठान चलता है। लोमहर्षण के पुत्र सौति उग्रश्रवा ने यहीं ऋषियों को पौराणिक कथाएं सुनायी थीं।
‘लोमहर्षणपुत्र उपश्रवाः सौतिः पौराणिको
नैमिषारण्ये शौनकस्य कुलपतेद्वदिशवार्षिके सत्रे,
सुखासीनानभ्यगच्छम् ब्रह्मर्षीन् संशितव्रतान्
विनयावनतो भूत्वा कदाचित् सूतनंदनः ।
तमाश्रममनुप्राप्तं नैमिषारण्यवासिनाम्,
चित्राः श्रोतुत कथास्तत्र परिवव्रस्तुपस्विन:’
(महाभारत, आदिपर्व १, १-२३)
वाराह पुराण के अनुसार यहां भगवान द्वारा निमिष मात्र में दानवों का संहार होने से यह ‘नैमिषारण्य’ कहलाया।
‘एवंकृत्वा ततो देवो मुनिं गोरमुखं तदा,
उवाच निमिषेणोदं निहतं दानवं बलम् ।
अरण्येऽस्मिं स्ततस्त्वेतन्नैमिषारण्य संज्ञितम्’
(वाराह पुराण अध्याय:११। श्लोक:१०८)
अर्थात् ऐसा करके उस समय भगवान ने गौरमुख मुनि से कहा कि मैंने एक निमिष में ही इस दानव सेना का संहार किया है, इसीलिए (भविष्य में) इस अरण्य को लोग नैमिषारण्य कहेंगे।
वायु, कूर्म आदि पुराणों के अनुसार भगवान के मनोमय चक्र की नेमि (हाल) यहीं विशीर्ण हुई (गिरी) थी, अतएव यह नैमिषारण्य कहलाया।
प्रययुस्तस्य चक्रस्य यत्र नेमिर्व्यशीर्यत ।
तद् वनं तेन विख्यातं नैमिषं मुनिपूजितम् ॥

नैमिषारण्य की परिक्रमा ८४ कोस की है। यह परिक्रमा प्रतिवर्ष फाल्गुनमास की अमावस्या के बाद की प्रतिपदा को प्रारंभ होकर पूर्णिमा को पूर्ण होती है । नैमिषारण्य की छोटी (अंतर्वेदी) में यहां के सभी तीर्थ आ जाते हैं।
वैदिक ग्रन्थों के कतिपय उल्लेखों में प्राचीन नैमिष वन की स्थिति सरस्वती नदी के तट पर कुरुक्षेत्र के समीप भी मानी गई है।

Content is available only for registered users. Please login or register

Source:- All © Copy rights subject to their publisher

  1. archive.org – श्रीलिंगमहापुराण (संस्कृत एवं हिन्दी अनुवाद) – Linga MahaPurana – Gita Press
  2. archive.org – 1.  2008 -Ling Mahapuran – Vol 1 Of 2 2. 2008 -Ling Mahapuran Vol 2 Of 2
  3. archive.org – Linga Purana (with the Shiva-toshini Sanskrit Commentary)

Buy Now:-

  1. श्रीलिंगमहापुराण (संस्कृत एवं हिन्दी अनुवाद): Linga Purana
  2. लिङ्ग महापुराणम् (संस्कृत एवं हिन्दी अनुवाद) The Linga Purana
Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.