श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय ३१ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय इकतीसवाँ अध्याय प्रचेताओं को श्रीनारदजी का उपदेश और उनका परमपद-लाभ श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी ! दस लाख वर्ष बीत जाने पर जब प्रचेताओं को विवेक हुआ, तब उन्हें भगवान् वाक्यों की याद आयी और वे अपनी भार्या… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय ३० ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तीसवाँ अध्याय प्रचेताओं को श्रीविष्णुभगवान् का वरदान विदुरजी ने पूछा — ब्रह्मन् ! आपने राजा प्राचीनबहिँ के जिन पुत्रों का वर्णन किया था, उन्होंने रुद्रगीत के द्वारा श्रीहरि की स्तुति करके क्या सिद्धि प्राप्त की ? ॥ १… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २९ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय उनतीसवाँ अध्याय पुरञ्जनोपाख्यान का तात्पर्य राजा प्राचीनबर्हि ने कहा — भगवन् ! मेरो समझ में आपके वचनों का अभिप्राय पूरा-पूरा नहीं आ रहा है । विवेकी पुरुष ही इनका तात्पर्य समझ सकते हैं, हम कर्ममोहित जीव नहीं ॥… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २८ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय अठ्ठाईसवाँ अध्याय पुरंजन को स्त्री योनि की प्राप्ति और अविज्ञात के उपदेश से उसका मुक्त होना श्रीनारदजी कहते हैं — राजन् ! फिर भय नामक यवनराज के आज्ञाकारी सैनिक प्रज्वार और कालकन्या के साथ इस पृथ्वीतल पर सर्वत्र… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २७ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सत्ताईसवाँ अध्याय पुरञ्जनपुरी पर चण्डवेग की चढ़ाई तथा कालकन्या का चरित्र श्रीनारदजी कहते हैं — महाराज ! इस प्रकार वह सुन्दरी अनेकों नखरों से पुरञ्जन को पूरी तरह अपने वश में कर उसे आनन्दित करती हुई विहार करने… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २६ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय छब्बीसवाँ अध्याय राजा पुरञ्जन का शिकार खेलने वन में जाना और रानी का कुपित होना श्रीनारदजी कहते हैं — राजन् ! एक दिन राजा पुरञ्जन अपना विशाल धनुष, सोने का कवच और अक्षय तरकस धारणकर अपने ग्यारहवें सेनापति… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २५ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पचीसवाँ अध्याय पुरञ्जनोपाख्यान का प्रारम्भ श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी ! इस प्रकार भगवान् शङ्कर ने प्रचेताओं को उपदेश दिया । फिर प्रचेताओं ने शङ्करजी की बड़े भक्तिभाव से पूजा की । इसके पश्चात् वे उन राजकुमारों के… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २४ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय चौबीसवाँ अध्याय पृथु की वंशपरम्परा और प्रचेताओं को भगवान् रुद्र का उपदेश श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुजी ! महाराज पृथु के बाद उनके पुत्र परम यशस्वी विजिताश्व राजा हुए । उनका अपने छोटे भाइयों पर बड़ा स्नेह था,… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २३ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तेईसवाँ अध्याय राजा पृथु की तपस्या और परलोकगमन श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — इस प्रकार महामनस्वी प्रजापति पृथु ने स्वयमेव अन्नादि तथा पुर-ग्रामादि सर्ग की व्यवस्था करके स्थावर-जङ्गम सभी की आजीविका का सुभीता कर दिया तथा साधुजनोचित धर्मों का… Read More


श्रीमद्भागवतमहापुराण – चतुर्थ स्कन्ध – अध्याय २२ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय बाईसवाँ अध्याय महाराज पृथु को सनकादि का उपदेश श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — जिस समय प्रजाजन परमपराक्रमी पृथ्वीपाल पृथु की इस प्रकार प्रार्थना कर रहे थे, उसी समय वहाँ सूर्य के समान तेजस्वी चार मुनीश्वर आये ॥ १ ॥… Read More