अर्जुन बने अर्जुनी- निकुञ्ज लीला

एक समय यमुनाजी के तट पर किसी वृक्ष के नीचे भगवान् देवकीनन्दन के पार्षद अर्जुन बैठे थे, उन्होंने कथाप्रसंग में ही भगवान् से प्रश्न किया — हे दयासागर प्रभो ! श्रीशिव तथा ब्रह्माजी आदि ने भी आपके जिस रहस्य का दर्शन अथवा श्रवण न किया हो, उसी का मुझसे वर्णन कीजिये । पूर्व में आपने कहा था कि गोप-कन्याएँ मेरी प्रेयसी हैं । वे कितने प्रकार की और संख्या में कितनी हैं ? उनके नाम क्या-क्या हैं ? उनमें से कौन कहाँ रहती है ? हे प्रभो ! उनके कौन-कौन-से कर्म हैं ? तथा उनकी अवस्था क्या और वेष कैसा है ? हे भगवन् ! उनमें से किन-किनके साथ आप किस नित्य स्थान पर, जहाँ का आनन्द और वैभव भी नित्य है, एकान्त-विहार करते हैं । वह परम महान् शाश्वत स्थान कहाँ और कैसा है ? यदि आपकी मुझपर पूर्ण कृपा हो तो यहाँ मेरे सभी प्रश्नों का उत्तर दीजिये । हे पीड़ितों की पीड़ा हरनेवाले महाभाग ! आपके जिन अज्ञात रहस्यों को मैं पूछना भूल गया होऊँ, उन सबों का भी वर्णन कीजिये ।

अर्जुन के प्रश्नों को सुनकर भगवान् ने कहा — वह स्थान, वे मेरी वल्लभाएँ और उनके साथ का मेरा विहार, यह मेरे प्राणप्रिय पुरुषों के भी जानने की बात नहीं है । इसे तुम सच मानो । हे सखे ! उसकी चर्चा कर देने पर तुम्हें उसे देखने की उत्कण्ठा हो जायगी । जो रहस्य ब्रह्मा आदि के लिये भी द्रष्टव्य नहीं है, वह अन्य जनों के लिये कैसा है, यह कहने की बात नहीं । इसलिये हे भाई ! उसके बिना तुम्हारा क्या बिगड़ता है, उसे सुनने का आग्रह छोड़ दो ।

इस प्रकार भगवान् के दारुण वचन सुनकर अर्जुन दीनभाव से उनके युगल चरणारविन्दों पर दण्ड की भाँति गिर पड़े । तब भक्तवत्सल प्रभु ने हँसकर अपनी दोनों भुजाओं से उन्हें उठाया और बड़े प्रेम के साथ उनसे कहा — यदि तुम उस स्थान को देखना ही चाहते हो तो यहाँ उसका वर्णन करने से क्या लाभ ? जिस देवी से समस्त ब्रह्माण्ड का आविर्भाव हुआ है, वह अब भी जिसमें स्थित है और अन्त में जिसमें लीन होगा, उसी श्रीमती भगवती त्रिपुरसुन्दरी की अत्यन्त भक्तिपूर्वक आराधना करके उनको आत्मसमर्पण कर दो; क्योंकि उन देवी के बिना वह स्थान दिखा देने में मैं कभी समर्थ नहीं हूँ ।

भगवान् की बात सुनकर अर्जुन के नेत्र आनन्द से भर आये और उनके आदेशानुसार वे श्रीमती त्रिपुरादेवी के पादुका-स्थान को गये । वहाँ जाकर एवं देवी का दर्शन पाकर पार्थ का हृदय भक्ति से भर गया और ‘मेरा नाम अर्जुन है’ इस प्रकार कहकर उन्होंने हाथ जोड़े हुए बारम्बार प्रणाम किया, तत्पश्चात् एकान्त में खड़े हो गये ।

भगवती अर्जुन की उपासना तथा उन पर दयानिधि का अनुग्रह जानकर कृपापूर्वक बोली — ” हे वत्स ! इस संसार में कौन-सा अत्यन्त दुर्लभ शुभ कर्म तुमसे हुआ है, जिससे शरणागतवत्सल भगवान् ने तुम्हें इस अत्यन्त गूढ़ रहस्य को जानने का अधिकारी समझा है । हे पुत्र ! विश्वरूप भगवान् ने तुम पर जैसा अनुग्रह किया है, वैसा भूतलवासी अन्य मनुष्यों पर, स्वर्गवासी देवताओं पर, तपस्वी, योगी तथा अखिल भक्तों पर भी नहीं किया है; अतः तुम यहाँ आओ, मेरे कूलकुण्ड नामक सरोवर का आश्रय लो । देखो, यह निकटवर्तिनी देवी समस्त कामनाओं को देनेवाली है, तुम इसके साथ सरोवर पर जाओ और उसमें विधिवत् स्नान करके शीघ्र ही यहाँ लौट आओ ।’

यह सुनकर पार्थ ने उसी समय जाकर सरोवर में स्नान किया और तुरन्त लौट आये । उन्हें स्नान करके आये देखकर देवी ने उनसे न्यास और मुद्रा आदि कार्य कराया और उनके दाहिने कान में तत्काल सिद्धिदायिनी परा-बाला-विद्या का उपदेश किया; साथ ही उस मन्त्र का अनुष्ठान, पूजन, लक्षसंख्यक जप तथा करवीर (कनेर)—की लाख कलिकाओं द्वारा हवन आदि का यथोचित प्रयोग भी समझा दिया । तत्पश्चात् परमेश्वरी ने दया करके कहा — हे वत्स ! इसी विधि से मेरी उपासना करोगे तो तत्काल ही तुम्हारा श्रीकृष्ण की लीला में अधिकार हो जायगा ।

यह सुनकर अर्जुन ने इसी पद्धति से भगवती की आराधना आरम्भ कर दी और पूजन तथा जप करके देवी को प्रसन्न किया । तदनन्तर उन्होंने शुभ हवन तथा विधिपूर्वक स्नान करके अपने को कृतार्थ-सा माना और मनोरथ प्रायः प्राप्त हुआ ही समझा । इसी अवसर में देवी वहाँ आयी और मुसकराती हुई बोली — ‘बेटा ! इस समय तुम उस घर के अन्दर जाओ ।’ भगवती की आज्ञा पाकर उनकी सहचरी के साथ अर्जुन राधापति के स्थान पर गये, जहाँ सिद्ध भी नहीं पहुँच सकते । इसके बाद देवी की सखी के उपदेश से उन्होंने गोलोक से ऊपर स्थित नित्य वृन्दावन-धाम का दर्शन किया, जो पूर्ण प्रेमरसात्मक तथा परम गुह्य है ।

सखी के वचन से ही अपने दिव्य नेत्रों से उस रहस्यमय स्थान का दर्शन करके बढ़े हुए प्रेमोद्रेक से अर्जुन विह्वल हो उठे और मोहवश मूर्छित होकर वहीं गिर पड़े । फिर कठिनता से होश में आने पर सहचरी ने अपनी दोनों भुजाओं से उन्हें उठाया । उसके आश्वासन देने पर जब वे किसी तरह सुस्थिर हुए तो उससे पूछा, बताओ, अब और कौन-सा तप मुझे करना चाहिये ? — ऐसा कहकर भगवल्लीला-दर्शन की अत्यन्त उत्कण्ठा से कातर हो गये ।

तब भगवती की सखी उन्हें हाथ से पकड़कर वहाँ से दक्षिण ओर एक उत्तम स्थान पर ले गयी और वहाँ जाकर कहा — ‘हे पार्थ ! तुम इस शुभद जलराशि में स्नानार्थ प्रवेश करो । यह सहस्रदल कमल का आकर है, इसके चारों ओर चार घाट हैं । यह सरोवर जल-जन्तुओं से व्याप्त है, इसके भीतर प्रवेश करने पर तुम यहॉ की विशेष बातें देख सकोगे । यहाँ से दक्षिण-भाग में यह जो सरोवर है, इसका नाम मलय-निर्झर है । वहाँ मधूक के मधुर मकरन्द का पान हुआ करता है । यह सामने जो विकसित उद्यान है, यहाँ भगवान् गोविन्द वसन्त-ऋतु में वसन्त-कुसुमोचित मदनोत्सव करते हैं । यहाँ दिन-रात भगवान् श्रीकृष्ण की स्तुति होती है, इसलिये इस सरोवर में स्नान करके पूर्व-सरोवर के तट पर जाओ और उसके जल का आचमन करके अपना मनोरथ सिद्ध करो ।’

उसकी बात सुनकर अर्जुन ने ज्यों ही जल में प्रवेशकर डुबकी लगायी त्यों ही वह सहचरी अन्तर्धान हो गयी । और उन्होंने जल से निकलकर अपने को सम्भ्रम में पड़ी हुई एकाकिनी सुन्दरी रमणी के रूप में देखा । गोपीवल्लभ गोविन्द की माया से वह सुन्दरी अपने प्रथम शरीर की सब बातें भूल गयी और विस्मित-भाव से किंकर्तव्यविमूढ़ हो जहाँ-की-तहाँ खड़ी रह गयी । इतने में आकाश में सहसा यह गम्भीर शब्द हुआ कि —‘हे सुन्दरि ! तुम इसी मार्ग से पूर्व-सरोवर के तट पर चली जाओ और वहाँ के जल का आचमन करके अपना मनोरथ सिद्ध करो । हे वरवर्णिनि ! तुम खेद न करो; वहीं तुम्हारी सखियाँ हैं, वे तुम्हारे उत्तम मनोरथ को पूर्ण करेंगी । इस दैवी वाणी को सुनकर वह पूर्व-सरोवर के तट पर गयी । किशोरी वहाँ आचमन करके क्षणभर खड़ी रही । इसी समय कानों में कूजती हुई कांची तथा मंजीर की मधुर ध्वनि से मिश्रित किंकिणी की झनकार सुनायी देने लगी । फिर अद्भुत यौवन-सम्पन्न दिव्य वनिताओं का झुंड वहाँ आ पहुँचा ।

उस परम आश्चर्यदायी वनितावृन्द को देखकर वह मन-ही-मन कुछ सोचने लगी और पैर के अँगूठे से जमीन खोदती हुई सिर झुकाये खड़ी रही । इसके बाद इसे अकेली खडी देखकर वनिताओं ने परस्पर दृष्टिपात करके विचारा कि — ‘बड़ी देर से कौतूहल में पड़ी हुई यह कौन हमारी ही जाति की स्त्री है ?’ इस तरह सबों ने उसके ऊपर दृष्टि डालकर क्षणभर परस्पर मन्त्रणा की कि चलकर इसे जानना चाहिये । ऐसा सोचकर सभी कौतुकवश इसे देखने आयीं । उनमें से एक प्रियमुदा नाम की मनस्विनी बाला उसके पास जाकर प्रेमपूर्वक मधुर वाणी में बोली — ‘तुम कौन और किसकी कन्या हो ? तथा किसकी प्राणप्रिया हो ? तुम्हारा जन्म कहाँ हुआ है, किसके द्वारा तुम यहाँ आयी ? अथवा तुम स्वयं ही चली आयी हो ? चिन्ता करने से कोई लाभ नहीं, हमारे प्रश्नानुसार सब बातें हमसे कह दो । इस परमानन्दमय स्थान में भला किसी को क्या दु:ख है ?

इस तरह पूछने पर उसने विनीतभाव से उनके मनों को मोहते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा — मैं कौन हूँ ? किसकी कन्या अथवा प्रेयसी हूँ ? मुझे यहाँ कौन लाया अथवा मैं स्वयं चली आयी ? — इन बातों को भगवतीजी जानें, मुझे कुछ भी मालूम नहीं है । फिर भी मैं कुछ कहती हूँ, यदि मेरी बातों पर आपलोगों को विश्वास हो तो उसे सुनें । यहाँ से दक्षिण की ओर एक सरोवर है, मैं वहीं स्नान करने आयी और वहीं खड़ी रही । थोड़ी देर में उत्कण्ठावश मैं चारों ओर निहारने लगी, इतने में मुझे अद्भुत आकाशवाणी सुन पड़ी — हे सुन्दरि ! तुम इसी मार्ग से पूर्व-सरोवर पर चली जाओ और उसके जल का आचमन करके अपना मनोरथ सिद्ध करो; हे वरवर्णिनि ! खेद न करो; वहीं तुम्हारी सखियाँ हैं, वे तुम्हारे उत्तम मनोरथ को पूर्ण करेंगी । — यही सुनकर | मैं वहाँ से यहाँ चली आयी हूँ । यहाँ आने पर मैंने आचमन करके नाना भाँति की मधुर ध्वनि सुनी, तत्पश्चात् आपलोगों का शुभ दर्शन मिला । बस मन, वाणी और शरीर से इतना ही मुझे मालूम है । हे देवियो ! आप कौन हैं, किनकी कन्याएँ हैं, कहाँ आपलोगों की जन्म-भूमि है ? और किनकी आपलोग वल्लभाएँ हैं ?

यह सुनकर प्रियमुदा ने कहा — अच्छा मैं बतलाती हूँ । हे शुभे ! हमलोग वृन्दावन के कलानाथ गोविन्द की प्राणप्यारी सखियाँ तथा विहारसहचरियाँ हैं । हम आत्मानन्दमयी व्रजबालाएँ यहाँ आयी हुई हैं । ये श्रुतिगण तथा मुनिगण भी वनितारूप में यहाँ हैं । पूर्व-काल में हममें से जो-जो राधापति को अत्यन्त प्यारी थीं, वे ही यहाँ उनके संग नित्यविहार करनेवाली क्रीडा-भूमि की सहचरी हैं । हे भामिनि ! हमी लोगों के साथ तुम भी यहाँ विहार करोगी । हे सखी ! पूर्व सरोवर पर चलो, वहाँ तुम्हें विधिवत् स्नान कराकर मैं सिद्धिदायक मन्त्र दूँगी ।

इस प्रकार उसे ले आकर उसने विधिवत् स्नान कराया और वृन्दावनचन्द्र की प्रेयसी के उत्तम मन्त्र का दीक्षाविधि के साथ उपदेश किया; पुरश्चरण की विधि, ध्यान तथा होम जप की संख्या भी बतला दी । सखियों के लाये हुए सुगन्धित कुसुमों से और पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, धूप, दीप तथा भाँति-भाँति के दिव्य नैवेद्यों से उसने देवी की विधिवत् पूजा करके एक लाख मन्त्र-जप किया; फिर विधिपूर्वक हवन करके पृथ्वी पर साष्टांग प्रणाम किया । अनन्तर निर्निमेष दृष्टि से देखते हुए उसने देवी की स्तुति की ।

उसकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवती श्रीराधिका- देवी वहाँ पर प्रकट हुईं । कांचन तथा चम्पा के समान उनकी कमनीय कान्ति थी । प्रत्येक अंग में सौन्दर्य, लावण्य और माधुर्य था; शरत्काल के कलंकहीन कलाधर के समान उनके मुख की शोभा थी । स्नेहयुक्त मुग्ध-मुसकान त्रिभुवन-मोहिनी थी । वे भक्तवत्सला वरदायिनी देवी अपने शरीर की कान्ति से दसों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई बोलीं — ‘हे शुभे ! मेरी सखियों की बातें सत्य हैं, इसलिये तुम मेरी प्यारी सखी हो । उठो, चलो, मैं तुम्हारी कामना पूर्ण करती हूँ ।’

देवी के मुख से मनोवांछित वाणी सुनकर अर्जुनी पुलकित हो गयी और प्रेम-विह्वल हो नेत्रों में आँसू भरकर पुनः देवी के चरणों पर गिर पड़ी । तब देवी ने अपनी सखी प्रियंवदा से कहा — ‘तुम इसे हाथ का अवलम्बन देकर आश्वासन देती हुई मेरे साथ ले आओ ।’ प्रियंवदा ने ऐसा ही किया । उत्तर-सरोवर के तट पर पहुँचकर विधिपूर्वक अर्जुनी को नहलाया गया । फिर संकल्प-पूर्वक विधिवत् पूजन कराकर हरिवल्लभा श्रीराधादेवी ने गोकुलचन्द्र श्रीकृष्ण के मन्त्र का उपदेश किया । वे गोविन्द के संकेत को जानती थीं, अतः उसे उन्होंने अविचल भक्ति प्रदान की और मन्त्रराज मोहन का ध्यान भी बता दिया । इस अनुष्ठान में नील कमल के समान श्यामल, अलंकारों से विभूषित, कोटि कामदेव-सदृश सौन्दर्यशाली तथा रास रस के लिये उत्सुक श्रीकृष्णचन्द्र का ध्यान करना चाहिये ।

उपर्युक्त बातें अर्जुनी को समझाकर राधा ने पुनः प्रियंवदा से कहा — ‘जब तक इसका उत्तम पुरश्चरण पूर्ण न हो तबतक तुम सखियों के साथ सावधान होकर इसकी रक्षा करना ।’ यह कहकर वे स्वयं तो श्रीकृष्णचन्द्र के चरणों के निकट चली गयी और प्यारी सखियों के पास अपनी छाया रख दी । प्रियंवदा के आदेश से यहाँ अर्जुनी ने गोरोचन, कुंकुम और चन्दन आदि नाना मिश्रित द्रव्यों से अष्टदल कमल के आकार में एक यन्त्र बनाया तथा उसमें अद्भुत मोहन-मन्त्र का न्यास किया । इसके बाद ऋतुसम्भव विविध पुष्प, चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, मुखवास, वस्त्र, आभूषण और माला आदि से वाहन तथा आयुधों सहित भगवान् श्यामसुन्दर की पूजा करके उनकी स्तुति तथा नमस्कार भी किया और मन-ही-मन उनका स्मरण करने लगी ।

तब भक्ति के वशीभूत हो भगवान् श्यामसुन्दर ने मुसकान-भरी दृष्टि से संकेत करके राधा से कहा — ‘उस (अर्जुनी)—को यहाँ शीघ्र बुलाओ ।’ आज्ञा पाते ही देवी ने अपनी सखी शारदा को भेजकर उसे तुरन्त बुला लिया । वह रसिकशेखर श्रीकृष्णचन्द्र के सामने आते ही प्रेमविह्वल हो पृथिवी पर गिर पड़ी । उसे वहाँ सब कुछ अद्भुत दीखने लगा । उसके अंगों में स्वेद, पुलक और कम्प आदि सात्त्विक विकार होने लगे । बड़ी कठिनाई से किसी तरह उठकर जब उसने नेत्र खोले तो सबसे प्रथम वहाँ का विचित्र मनोरम स्थान दीख पड़ा । उसके बाद कल्पवृक्ष पर दृष्टि पड़ी, वह वृक्ष काम-सम्पदा को देनेवाला था । उसके नीचे रत्नमन्दिर था, उसमें एक रत्नमय सिंहासन रखा था । उसके ऊपर भी अष्टदल पद्म बना हुआ था । उसमें बायें-दायें के क्रम से शंख और पद्म निधि रखे गये थे । चारों ओर जगह-जगह कामधेनु गौएँ थीं । सब ओर नन्दनवन था, उसमें मलयसमीर बह रहा था । ऐसे रमणीय स्थान में भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान थे ।

उनके अंग की कान्ति श्यामल थी; अलकावली स्निग्ध, असित एवं भंगुरित थी; मत्त मयूरों के शिखर से उनकी चूडा बाँधी गयी थी, बायें कान के पुष्पमय आभूषण पर भ्रमर बैठे थे, दर्पण के सामन स्निग्ध कपोल चंचल अल्कों के प्रतिबिम्ब से शोभित हो रहे थे । मस्तक में सुन्दर तिलक लगा था । तिलके फूल और शुक की चोंच के समान उनकी मनोहर नासिका थी । बिम्बफल के सदृश सुन्दर अरुण अधर थे । वे अपनी मन्द मुस्कान से प्रेमोद्दीपन कर रहे थे । गले में मनोहर वनमाला थी और सहस्र मदोन्मत्त भ्रमरों से भरी हुई पारिजात की सुन्दर माला दोनों स्थूल कन्धों पर शोभायमान थी । मुक्ताहार तथा कैस्तुभमणि से वक्षःस्थल विभूषित था, उसमें श्रीवत्स का चिह्न भी था । आजानु लम्बी भुजाएँ मनोहर थीं । नाभि गम्भीर और मध्यभाग सिंह की कटि से भी कहीं अधिक सुन्दर था । वे अपने लावण्य से कोटि-कन्दर्प को पराजित करते थे । वेणु के मनोहर गान से वे त्रिभुवन को सुख के समुद्र में निमग्न तथा मोहित कर रहे थे । उनका प्रत्येक अंग प्रेमावेश से पूर्ण और रास-रस से आलस्ययुक्त हो रहा था ।

उनके मुख की ओर दृष्टि लगाये अनेकों सेविकाएँ यथास्थान खड़ी रहकर उनके संकेतों को देख रही थीं और सम्मानपूर्वक चामर, व्यजन, माला, गन्ध, चन्दन, ताम्बुल, दर्पण, पानपात्र तथा अन्य क्रीडोपयोगी विविध वस्तुओं को वे पृथक्-पृथक् रख रही थीं । श्रीमती राधिकादेवी उनके वामभाग में विराजमान होकर प्रसन्नतापूर्वक उनकी आराधना करती हुई हँस-हँसकर उन्हें पान देती थीं । यह सब देखकर वह अर्जुनी प्रेमावेश से विह्वल हो गयी । सर्वज्ञ हृषीकेश ने उसके भावों को समझ लिया और क्रीडावन में उसकी इच्छानुसार उसे सुख दिया । तदनन्तर शारदा से कहा — ‘इसे शीघ्र ले जाकर पश्चिम सरोवर में नहलाओ ।’

शारदा उसे वहाँ ले गयी और क्रीडासर में स्नान करने को कहा । परन्तु भीतर जाते ही वह पुनः अर्जुन बन गयी । उसी समय वहाँ भगवान् श्रीकृष्ण ने प्रकट होकर जब अर्जुन को खिन्न तथा हताश देखा तो प्रेमपूर्वक हाथ से स्पर्श करके उन्हें फिर पूर्ववत् कर दिया और कहा — ‘अर्जुन ! तुम मेरे प्रिय सखा हो, इस त्रिलोकी में तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी मेरा रहस्य नहीं जानता । देखना, इसे कहीं प्रकाशित न करना ।’
[ पद्मपुराण]

 

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