भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १० से ११
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(मध्यमपर्व — प्रथम भाग)
अध्याय – १० से ११
प्रासाद, उद्यान आदि के निर्माण में भूमि-परिक्षण तथा वृक्षारोपण की महिमा

सूतजी बोले — ब्राह्मणों ! देवमन्दिर, तडाग आदि के निर्माण करने में सबसे पहले प्रमाणानुसार गृहीत की गयी भूमि का संशोधन कर दस हाथ अथवा पाँच हाथ के प्रमाण में बैलों से उसे जुतवाना चाहिये । देवमन्दिर के लिये गृहीत भूमि को सफेद बैलों से तथा कूप, बगीचे आदि के लिये काले बैलों से जुतवाये । यदि वह भूमि ग्रह-याग के लिये हो तो उसे जुतवाने की आवश्यकता नहीं, मात्र उसे स्वच्छ कर लेना चाहिये । उस पूर्वोक्त स्थान को तीन दिन जुतवाना चाहिये । फिर उसमें पाँच प्रकार के धान्य बोने चाहिये । देवपक्ष में तथा उद्यान के लिये सात प्रकार के धान्य वपन करने चाहिये । om, ॐ मूँग, उड़द, धान, तिल, साँवा — ये पाँच व्रीहिगण हैं । मसूर और मटर या चना मिलाने से सात व्रीहिगण होते हैं । (यदि ये बीज तीन, पाँच या सात रातों में अङ्कुरित हो जाते हैं तो उनके फल इस प्रकार जानने चाहिये — तीन रातवाली भूमि उत्तम, पाँच रातवाली भूमि मध्यम तथा सात रातवाली भूमि कनिष्ठ है । कनिष्ठ भूमि को सर्वथा त्याग देना चाहिये ।) श्वेत, लाल, पीली और काली — इन चार वर्णों वाली पृथ्वी क्रमशः ब्राह्मणादि चारों वर्णों के लिये प्रशंसित मानी गयी है । प्रासाद आदि के निर्माण में पहले भूमि की परीक्षा कर लेनी चाहिये । उसकी एक विधि इस प्रकार है – अरत्निमात्र (लगभग एक हाथ लम्बा) बिल्वकाष्ठ को बारह अंगुल के गढ्ढे में गाड़कर, उसके भूमि से ऊपरवाले भाग में चारों ओर चार लकडियाँ लगाकर उन्हें ऊन से लपेटकर तेल से भिगो ले । इन्हें चार बत्तियों के रूप में दीपक की भाँति प्रज्वलित करे । पूर्व तथा पश्चिम की ओर बत्ती जलती रहे तो शुभ तथा दक्षिण एवं उत्तर की ओर की जलती रहे तो अशुभ माना गया है । यदि चारों बत्तियाँ बुझ जायँ या मन्द हो जायँ तो विपत्तिकारक हैं ।Content is available only for registered users. Please login or register इसप्रकार सम्यक्-रूप से भूमि की परीक्षा कर उस भूमि को सुत्र से आवेष्टित तथा कीलित कर वास्तु का पूजन करे । तदनन्तर वास्तुबलि देकर भूमि खोदनेवाले खनित्र की भी पूजा करे ।वास्तु के मध्य में एक हाथ के पैमाने में भूमि को घी, मधु, स्वर्णमिश्रित जल तथा रत्नमिश्रित जल से ईशानाभिमुख होकर लीप दे, फिर खोदते समय “आ ब्रह्मन् ब्राह्मणों Content is available only for registered users. Please login or register
इस मन्त्र का उच्चारण करे । जो वास्तुदेवता का बिना पूजन किये प्रासाद, तडाग आदि का निर्माण करता है, यमराज उसका आधा पुण्य नष्ट कर देते हैं ।

अतः प्रासाद, आराम, उद्यान, महाकूप, गृहनिर्माण में पहले वास्तुदेवता का विधिपूर्वक पूजन करना चाहिये । जहाँ स्तम्भ की आवश्यकता हो वहाँ साल, खैर, पलास, केसर, बेल तथा बकुल — इन वृक्षों से निर्मित यूप कलियुग में प्रशस्त माने गये हैं । यदि वापी, कूप आदि का विधिहीन खनन एवं आम्र आदि वृक्षों का विधिहीन रोपण करे, तो उसे कुछ भी फल प्राप्त नहीं होता, अपितु केवल अधोगति ही मिलती है । नदी के किनारे, श्मशान तथा अपने घर से दक्षिण की ओर तुलसी-वृक्ष का रोपण न करे, अन्यथा यम-यातना भोगनी पड़ती है । विधि-पूर्वक वृक्षों का रोपण करने से उसके पत्र, पुष्प तथा फल के रज-रेणुओं आदि का समागम उसके पितरों को प्रतिदिन तृप्त करता है ।जो व्यक्ति छाया, फुल और फल देनेवाले वृक्षों का रोपण करता है या मार्ग में तथा देवालय में वृक्षों को लगाता है, वह अपने पितरों को बड़े-बड़े पापों से तारता है और रोपणकर्ता इस मनुष्य-लोक में महती कीर्ति तथा शुभ परिणाम को प्राप्त करता है और अतीत तथा अनागत पितरों को स्वर्ग में जाकर भी तारता ही रहता है । अत: द्विजगण ! वृक्ष लगाना अत्यन्त शुभदायक है । जिसको पुत्र नहीं है, उसके लिये वृक्ष ही पुत्र हैं, वृक्षारोपणकर्ता के लौकिक-पारलौकिक कर्म वृक्ष ही करते रहते हैं तथा स्वर्ग प्रदान करते हैं । यदि कोई अश्वत्थ-वृक्ष का आरोपण करता है तो वही उसके लिये एक लाख पुत्रों से भी बढ़कर है । अतएव अपनी सद्गति के लिये कम-से-कम एक या दो या तीन अश्वत्थ-वृक्ष लगाना ही चाहिये । हजार, लाख, करोड़ जो भी मुक्ति के साधन हैं, उनमें एक अश्वत्थ-वृक्ष लगाने की बराबरी नहीं कर सकते ।

अशोक-वृक्ष लगाने से कभी शोक नहीं होता, प्लक्ष (पाकड़) —वृक्ष उत्तम स्त्री प्रदान करवाता है, ज्ञानरुपी फल भी देता है । बिल्व-वृक्ष दीर्घ आयुष्य प्रदान करता है । जामुन का वृक्ष धन देता है, तेंदू का वृक्ष कुलवृद्धि कराता है । दाडिम (अनार) का वृक्ष स्त्री-सुख प्राप्त कराता है । बकुल पाप-नाशक, वंजुल (तिनिश) बल-बुद्धि-प्रद है । धातकी (धव) स्वर्ग प्रदान करता है । वटवृक्ष मोक्षप्रद, आम्रवृक्ष अभीष्ट कामनाप्रद और गुवाक (सुपारी)— का वृक्ष सिद्धिप्रद है । बल्वल, मधूक (महुआ) तथा अर्जुन-वृक्ष सब प्रकार का अन्न प्रदान करता है । कदम्ब-वृक्ष से विपुल लक्ष्मी की प्रप्ति होती है । तिन्तिडी (इमली)— का वृक्ष धर्मदूषक माना गया है । शमी-वृक्ष रोग-नाशक है । केशर से शत्रुओं का विनाश होता है । श्वेत वट धनप्रदाता पनस (कटहल)—वृक्ष मन्द बुद्धिकारक है । मर्कटी (केंवाच) एवं कदम-वृक्ष के लगाने से संतति का क्षय होता है ।
शीशम, अर्जुन, जयन्ती, करवीर, बेल तथा पलाश — वृक्षों के आरोपण से स्वर्ग की प्राप्ति होती है । विधिपूर्वक वृक्ष का रोपण करने से स्वर्ग-सुख प्राप्त होता है और रोपणकर्ता के तीन जन्मों के पाप नष्ट हो जाते है । सौ वृक्षों का रोपण करनेवाला ब्रह्मारूप और हजार वृक्षों का रोपण करनेवाला विष्णुरूप बन जाता है । वृक्ष के आरोपण में वैशाख मास श्रेष्ठ एवं ज्येष्ठ अशुभ है । आषाढ़, श्रावण तथा भाद्रपद ये भी श्रेष्ठ हैं । आश्विन, कार्तिक में वृक्ष लगाने से विनाश या क्षय होता है । श्वेत तुलसी प्रशस्त मानी गयी है । अश्वत्थ, वटवृक्ष और श्रीवृक्ष का छेदन करनेवाला व्यक्ति ब्रह्मघाती कहलाता है । वृक्षच्छेदी व्यक्ति मूक और सैकड़ों व्याधियों से युक्त होता है । तिन्तिडी के बीजों को इक्षुदण्ड से पीसकर उसे जल में मिलाकर सींचने से अशोक की तथा नारियल के जल एवं शहद-जल से सींचने से आम्रवृक्ष वृद्धि होती है । अश्वत्थ वृक्ष के मूल से दस हाथ चारों ओर का पवित्र पुरुषोत्तम क्षेत्र माना गया है और उसकी छाया जहाँ तक पहुँचती है तथा अश्वत्थ वृक्ष के संसर्ग से बहनेवाला जल जहाँ तक पहुँचता हैं, वह क्षेत्र गङ्गा के समान पवित्र माना गया है ।

सूतजी पुनः बोले — विप्रश्रेष्ठ ! तान्त्रिक पद्धति के अनुसार सभी प्रतिष्ठादि कार्यों में शुद्ध दिन ही लेना चाहिये । वृक्षों के उद्यान में कुआँ अवश्य बनवाना चाहिये । तुलसी वन में कोई याग नहीं करना चाहिये । तालाब, बड़े बाग़ तथा देवस्थान के मध्य सेतु नहीं बनवाना चाहिये । परन्तु देवस्थान में तडाग बनवाना चाहिये । शिवलिङ्ग की प्रतिष्ठा में अन्य देवों की स्थापना नहीं करनी चाहिये । इसमें देश-काल (और शैवागमों)— की मर्यादा के अनुसार आचरण करना चाहिये । उनके विपरीत आचरण करने पर आयु का ह्रास होता है । द्विजगण ! तालाब, पुष्करिणी तथा उद्यान आदि का जो परिमाण बताया गया हो, यदि उससे कम पैमाने पर ये बनाये जायें तो दोष है, किन्तु दस हाथ के परिणाम में हो तो कोई दोष नहीं है । यदि ये दो हजार हाथों से अधिक प्रमाण में बनाये गये हो तो उनकी प्रतिष्ठा विधिपूर्वक अवश्य करनी चाहिये ।
(अध्याय १० – ११)

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2.
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय २ से ३
4.
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय ४
5.
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय ५
6.
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय ६
7.
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय ७ से ८
8.
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय ९

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