November 18, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-117 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पराजित होकर दैत्यराज सिन्धु का अपने भवन में आकर अत्यन्त चिन्ताग्रस्त होना, उसकी पत्नी दुर्गा का वहाँ उपस्थित होना, दुर्गा के पूछने पर दैत्यराज सिन्धु का अपनी चिन्ता का कारण बतलाना, दुर्गा का उसे समझाना तथा मयूरेश से सन्धि करने के लिये कहना, किंतु सिन्धु का उसके प्रस्ताव को अस्वीकृतकर पुनः युद्ध के लिये सुसज्जित होना अथः सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः दुर्गावाक्यं ब्रह्माजी बोले — दैत्यराज सिन्धु शय्या पर पड़ा- पड़ा अत्यन्त चिन्तित हो उठा। उसका हृदय [ चिन्ता एवं क्रोधरूपी अग्नि से] अत्यधिक सन्तप्त हो रहा था, इस कारण वह कुछ सोच-विचार नहीं कर पा रहा था ॥ १ ॥ वह हर्ष से सर्वथा रहित, म्लान मुख वाला, तेज से हीन तथा पौरुष से रहित हो गया था । तदनन्तर दैत्य की दुर्गा नामक अत्यन्त सुन्दर पत्नी, जो उग्र की पुत्री थी और सौन्दर्य की लहरी के समान थी, वह पलंग पर बैठे हुए अपने पति सिन्धु को चिन्तारूपी नागिन के विष द्वारा दग्ध हुआ जानकर उसके समीप में गयी। उस सुन्दरी दुर्गा के मस्तक पर अनेक आभूषणों से रचित बालों की लट सुशोभित हो रही थी, उसके ललाट पर कस्तूरी का सुन्दर तिलक लगा हुआ था, उसने कण्ठ में हार धारण कर रखा था और अपने कटिदेश में रत्नों से समन्वित करधनी धारण कर रखी थी। सभी अलंकारों से अलंकृत तथा सभी सुन्दर अंगोंवाली दैत्यराज सिन्धु की पत्नी को उत्सुक होकर शय्या के समीप आया देखकर उस समय वहाँ उपस्थित सभी सेवक वहाँ से बाहर चले गये, तब वह अपने पति से बोली ॥ २–५१/२ ॥ दुर्गा बोली — हे स्वामिन्! आप चिन्ता क्यों करते हैं? जो होने वाला है, वह अवश्य ही होकर रहेगा। यह समस्त संसार ईश्वर के अधीन है, कभी भी कोई स्वतन्त्र नहीं है। आप सभी जनों के मन में तथा मेरे मन में भी उद्वेग क्यों पैदा कर रहे हैं ? हे विभो ! आपके चिन्ता करने का क्या कारण है, मुझे बतायें, मैं उसका उपाय आपको बताऊँगी ॥ ६–७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — अपनी प्रिय पत्नी के वचनों का श्रवण करके गण्डकीनगर का राजा वह सिन्धु सावधान-मन होकर सम्पूर्ण वृत्तान्त उसे बताने लगा ॥ ८१/२ ॥ सिन्धु बोला — हे प्रिये! हे श्लाघ्ये! मन को अत्यन्त कष्ट पहुँचाने वाली बात तुम्हें क्या बतलाऊँ । युद्ध करते समय मयूरेश ने मेरे दोनों कानों को काट डाला। उनकी सात करोड़ संख्या वाली सेना को मैंने अपने बल- पराक्रम से मार डाला। स्कन्द आदि महान् वीरों को मैंने अपनी बाणवर्षा के द्वारा गिरा दिया, किंतु अकस्मात् उस शत्रु मयूरेश ने त्रिशूल छोड़कर मेरे दोनों कानों को काट डाला। तब मैं वस्त्र से अपना मुख ढककर अपने भवन में चला आया। अब जिस उपाय से मेरे शत्रु का वध हो, वह मुझे बताओ ॥ ९–१२ ॥ दुर्गा बोली — हे स्वामी! आपने क्षत्रिय धर्म का ठीक-ठीक पालन किया है, और सभी सैनिकों को भी मार डाला है, किंतु गौ, ब्राह्मण और देवताओं से वैर करने वाले यश को प्राप्त नहीं करते हैं ॥ १३ ॥ इनसे द्वेष करने पर किसी का भी कभी भला नहीं होता है। इन गो, ब्राह्मण तथा देवतादि की सेवा करने से, इनका वन्दन करने से, इनका ध्यान करने से, इनका स्मरण करने से तथा इनका पूजन करने से ही इन्द्र आदि देवताओं ने अपना-अपना पद प्राप्त किया है और वे अपने-अपने पद पर बने भी हुए हैं ॥ १४१/२ ॥ जो सभी प्राणियों में समता का भाव रखता है और शुभ तथा अशुभ फल देने में समर्थ है, उस (परमात्मा)- की सेवा करने से कामधेनु की सेवा के समान निश्चित ही अभीष्ट की सिद्धि होती है। जैसा बीज बोया जाता है, वैसा ही अंकुर उत्पन्न होता है ॥ १५-१६ ॥ अशुभ कर्म से दुःख और शुभ कर्म से सुख की प्राप्ति होती है, अतः सदाचारी पुरुष सदा ही बड़े आदरपूर्वक शुभ कर्म ही करते हैं और शरीर से, मन से तथा वाणी से सभी प्राणियों का कल्याण करते हैं ॥ १७१/२ ॥ आपने तो अपना पौरुष दिखाकर उन देवताओं तथा ऋषियों को सदा ही दुःख पहुँचाया है, सच्चा पुरुषार्थ तो उसी को मानना चाहिये, जो पुरुषार्थचतुष्टय अर्थात् धर्म-अर्थ-काम एवं मोक्ष को प्राप्त कराने वाला हो। जिसका मन धन के प्रति लोभ न करता हो और न कभी परायी स्त्री के प्रति आकृष्ट होता हो, जो कभी भी अनिन्दनीय की निन्दा न करता हो, जो सदा शरण में आये हुए की रक्षा में दृढ़प्रतिज्ञ हो और सदा धर्माचरण में अनुरक्त रहता हो, उस पुरुष का किया वह सत्कर्म ही पुरुषार्थ है। सभी प्राणियों में समान बुद्धि रखने को ही पुरुषार्थ जानना चाहिये। जो मनुष्य निश्छल भाव से दूसरे के दुःख का निवारण करता है, और उसके दुःख के कारण स्वयं भी दुःख का अनुभव करता है, वह व्यक्ति ही पुरुषार्थी कहा जाता है ॥ १८-२११/२ ॥ हे स्वामी ! मेरे श्रेष्ठ वचन को सुनिये, जो आपके लिये परम कल्याणकारी है। आप दुर्वचन बोलने वाले न बनें, सदा सत्यधर्म में परायण रहें, अपने गुणों का अपने मुख से बखान न करें, सदा ही परोपकार में परायण रहें और कभी भी दूसरे की निन्दा न करें। हे महाभाग ! यदि आप मेरा स्नेह पाना चाहते हैं, तो जो मैं कहती हूँ, उसका अनुपालन करें। आप बन्धक बनाये गये इन्द्रसहित सभी देवताओं को बन्धन से मुक्त कर दें। ऐसा होने पर सम्पूर्ण लोकों के पालनकर्ता वे मयूरेश वापस चले जायँगे । हे स्वामिन्! तब हम सभी सुखपूर्वक रहेंगे और इसके विपरीत होने पर हमें सुख नहीं प्राप्त होगा ॥ २२–२५ ॥ ब्रह्माजी बोले — दुर्गा द्वारा कहा गया इस प्रकार का वचनरूपी अमृत उस दैत्य सिन्धु को उसी प्रकार विष के समान प्रतीत हुआ जैसे कि मृत्यु की अभिलाषा रखने वाले पुरुष को तथा ग्रहों की बाधा से पीड़ित व्यक्ति को औषधि विषतुल्य प्रतीत होती है । दैत्यराज सिन्धु ने अपनी पत्नी के उस कल्याणकारी उपदेश को हृदय में धारण नहीं किया, वह क्रोध से आँखें लाल करता हुआ उस दुर्गा से बोला — हे भद्रे ! तुमने लोक में निन्दा कराने वाले वचन को कहकर ठीक ही किया है। कार्य तथा अकार्य के विषय में ज्ञान रखने-वाले मैंने तुम्हारी चतुराई को जान लिया है ॥ २६–२८ ॥ जिसे अपना मान प्रिय हो, ऐसा कोई नहीं, जो शत्रु की शरण में जाता हो । प्रथम तो अन्यायपूर्ण कार्य करना ही नहीं चाहिये, फिर अगर उसका प्रारम्भ कर ही दिया हो तो किसी प्रकार भी उसका परित्याग नहीं करना चाहिये। भले ही उस कार्य से उसे सुख हो अथवा दुःख हो, यश प्राप्त हो अथवा परिणाम में अपयश हो, लाभ की प्राप्ति हो अथवा हानि हो, इतना ही नहीं जीवन रहे अथवा मृत्यु ही हो जाय ॥ २९-३० ॥ हे कल्याणी ! पहले मैंने उसके साथ सामनीति का प्रयोग करके सन्धि नहीं की, फिर अब जो-जो भी होना हो, वह अवश्य होकर ही रहे ॥ ३१ ॥ हे साध्वी! विधाता ने जन्म से पूर्व ही जिस-जिस प्राणी के विषय में उचित अथवा अनुचित जो भी लिख दिया है, कोई भी ऐसा सामर्थ्यवान् नहीं है, जो अपने पुरुषार्थ के बल पर उसे अन्यथा कर दे ॥ ३२ ॥ युद्ध में वीरगति प्राप्त होने पर तो स्वर्ग की प्राप्ति होगी और तीनों लोकों में यश होगा, किंतु शत्रु की शरण में जाने पर तो अपयश भी होगा और अपने पूर्वजोंसहित मुझे शीघ्र ही नरक भी जाना पड़ेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ३३१/२ ॥ मैं उन मयूरेश को भलीभाँति जानता हूँ, वे देवों के भी देव हैं और सम्पूर्ण जगत् के गुरु हैं, और वे मेरे विनाश के लिये उसी प्रकार प्रकट हुए हैं, जैसे रावण के विनाश के लिये रघुवंश में श्रीराम अवतरित हुए थे। तथापि मेरी यह निश्चित बुद्धि है कि मैं उनका सिर काटकर गिरा डालूँगा ॥ ३४-३५ ॥ शूरवीर अपना शरीर छोड़ देते हैं, किंतु स्वाभिमान को कभी नहीं छोड़ते। हे सुन्दर भौंहोंवाली ! मेरे सामने यमराज की भी कभी कोई गणना नहीं है, तो फिर अन्य की क्या गणना ! उसने तो मेरे कान काटकर मुझे लज्जित किया है ॥ ३६१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहकर दैत्यराज सिन्धु ने अपने आभूषणों और वस्त्रों को धारण किया। उसने बाजू-बन्द, मुकुट, रत्नजटित हार तथा कुण्डल धारण किये और दो तरकस, तलवार, ढाल, प्रत्यंचा से समन्वित धनुष तथा छुरिका आदि शस्त्रों को ग्रहण किया ॥ ३७-३८ ॥ तदनन्तर अपनी पगड़ी में लगे हुए सुनहले वस्त्र से अपने दोनों कानों को ढककर वह आया और एक श्रेष्ठ भद्रासन पर बैठ गया ॥ ३९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘दुर्गावाक्य’ नामक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११७ ॥ Content is available only for registered users. 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