श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-154
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ चौवनवाँ अध्याय
राजा के पूछने पर गणपति दूतों का काशी में स्थित विनायकों के आवरणों का क्रमिक वर्णन
अथः चतुःपञ्चाशदुत्तरशततमोऽध्यायः
षट्पञ्चाशद्विनायकवर्णनं

ऋषिगण बोले — हे अनघ ! विमान में बैठे हुए राजा सोमकान्त ने [दूतों से] क्या पूछा था, उसे हम सभी सुनना चाहते हैं, अत: वह सब हमें पूर्णरूप से बतलाइये ॥ १ ॥

सूतजी बोले — हे अनघ ऋषियो! आकाशमार्ग से जाते हुए महामना नरेश ने दूतों से महात्मा गणेश के वाराणसी में स्थित परिवारों (आवरणों) – के नामों को जानना चाहा था। उनका आप लोग श्रवण कीजिये ॥ २१/२

राजा ने कहा — हे दूतो ! स्मरणमात्र से समस्त सिद्धियों को देने वाले और विश्वेश के परिवार देवताओं में परिगणित गणपति-विग्रहों के बारे में आप लोग कृपापूर्वक मुझको सम्पूर्ण रूप से बतलाइये ॥ ३१/२

दूत बोले — हे राजन्! समस्त भयों को दूर करने वाले और विश्वेश्वर के परिवार देवताओं के रूप में परिगणित गणपतिविग्रहों के विषय में हम बता रहे हैं; आप श्रवण कीजिये ॥ ४१/२

[वाराणसी को आवृत कर स्थित गणपति के सात आवरणों में अन्यतम] प्रथम आवरण के अन्तर्गत दुर्ग-विनायक, अर्कविनायक, भीमचण्डीविनायक, देहली- विनायक, उद्दण्डविनायक, पाशपाणिविनायक, खर्व- विनायक तथा सिद्धिप्रद सिद्धिविनायक — ये आठ विनायक हैं ॥ ५–६१/२

द्वितीय आवरण में लम्बोदर विनायक, कूट-दन्तविनायक, शूलटंकविनायक, चौथे कूष्माण्डविनायक, पाँचवें मुण्डविनायक, विकटद्विजविनायक, राजपुत्र- विनायक तथा अन्तिम प्रणवविनायक — ये आठ विनायक स्थित हैं ॥ ७–८१/२

तृतीय आवरण में वक्रतुण्डविनायक, एकदन्तविनायक, त्रिमुखविनायक, पंचमुखविनायक, हेरम्बविनायक, विघ्नराजविनायक, वरदविनायक तथा मोदकप्रिय विनायक — ये आठ विनायक स्थित हैं ॥ ९-१०१/२

चतुर्थ आवरण में अभयप्रद विनायक, सिंहतुण्ड- विनायक, कूणिताक्षविनायक, क्षिप्रप्रसादविनायक, चिन्तामणिविनायक, दन्तहस्तविनायक, प्रचण्डविनायक तथा उद्दण्डमुण्ड-विनायक — ये आठ विनायक स्थित जानने चाहिये ॥ ११–१३ ॥ पंचम आवरण में स्थूलदन्तविनायक, कलिप्रिय- विनायक, चतुर्दन्तविनायक, द्वितुण्डविनायक, ज्येष्ठ- विनायक, गजविनायक, कालविनायक तथा मार्गेश- विनायक (नागेश या नागविनायक) — ये आठ विनायक जानने चाहिये ॥ १४-१५ ॥ षष्ठ आवरण में मणिकर्णिविनायक, आशाविनायक, सृष्टिविनायक, यक्षविनायक, गजकर्णविनायक, चित्रघण्ट-
विनायक, सुमंगलविनायक तथा मित्रविनायक — ये आठ विनायक स्थित हैं ॥ १६१/२

सप्तम आवरण में मोदविनायक, प्रमोदविनायक, सुमुखविनायक, दुर्मुखविनायक, गणपविनायक, ज्ञान-विनायक, द्वारविनायक तथा आठवें मोक्षप्रद अविमुक्त- विनायक — ये आठ विनायक स्थित हैं ॥ १७–१८१/२

इन [आवरणस्थ विनायकों ] -के अतिरिक्त भी भगीरथविनायक, हरिश्चन्द्रविनायक, कपर्दीविनायक तथा बिन्दुविनायक आदि अन्य विनायक स्थित हैं। इन सभी विनायकों का नित्यप्रति स्मरण सभी कामनाओं को फलीभूत करने वाला है ॥ १९-२० ॥

जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर शुद्ध चित्त से इनके नामों का पाठ करता है, उसके किसी भी कार्य में विघ्न (उपद्रवादि) बाधा नहीं पहुँचाते हैं। हे राजेन्द्र! भक्तिमान् मनुष्य को चाहिये कि वह विनायकों के एक-एक नाम का उच्चारण करके दूर्वांकुर, तिल, अक्षत तथा शमीपत्रों से इनकी पूजा करे ॥ २१-२२ ॥ ऐसा करने वाला मनुष्य असाध्य कार्यों को भी सिद्ध कर लेगा, उसे सर्वत्र विजय मिलेगी और वह आयुष्य, पुष्टि, धन तथा आरोग्य प्राप्त करेगा ॥ २३ ॥

हे नृप ! जो तुमने पूछा था, वह सब हमने बता दिया है, ऐसा कहकर वे दूत मौन हो गये और प्रसन्नतापूर्वक अपने (गणपतिके) धाम को चले गये ॥ २४ ॥

सूतजी बोले — हे विप्रो ! यह जो विश्वेश्वर के आवरणों के बारे में आप लोगों ने पूछा था, वह मैंने बता दिया है। अब मैं गणेशपुराण की फलश्रुति का वर्णन करूँगा ॥ २५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तर्गत ‘छप्पन विनायकों का वर्णन’ नामक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५४ ॥

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