श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-41 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ इकतालीसवा अध्याय श्रीगणेशजी का कलाधर विप्र के रूप में त्रिपुरासुर के पास आना और उसे स्वर्ण, रजत एवं लौह से निर्मित तीन पुर प्रदान करना अथः एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः गजाननेन ब्राह्मणरूपेण त्रिपुरं पुरतः समर्पणम् व्यासजी बोल — हे चतुर्मुख ब्रह्माजी! [सृजन, पालन और संहार आदि] सम्पूर्ण कार्यों को सम्पन्न करने वाले वरदायक… Read More


श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-40 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ चालीसवाँ अध्याय ब्रह्मा, विष्णु और शिव का त्रिपुरासुर के भय से अपने-अपने लोकों से पलायन, देवताओं द्वारा गणेशाराधन, गणेशजी का प्रकट होना, देवताओं द्वारा संकष्टनाशन स्तोत्र से उनका स्तवन अथः चत्वारिंशोऽध्यायः त्रिपुरासुरेण ब्रह्मदेवस्य पराजयः, देवैश्च तपः स्तोत्र निरूपणं ब्रह्माजी बोले — [हे व्यास!] देवलोक पर अधिकार करके वह दैत्य ब्रह्मलोक… Read More


श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-39 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ उनतालीसवाँ अध्याय त्रिपुरासुर का इन्द्र पर आक्रमण कर अमरावतीपुरी पर अधिकार कर लेना अथः एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः इन्द्रपराजयः व्यासजी बोले — हे ब्रह्मन्‌! गणेशजी से वरदान प्राप्त करने के बाद वरप्राप्ति के अहंकार से भरे त्रिपुरासुर ने क्या किया? उसे आप बिना कुछ शेष रखे बताइये, उस विषय में मुझे कौतूहल हो… Read More


श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-38 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अड़तीसवाँ अध्याय गृत्समद की छींक से एक बालक का जन्म, उसके द्वारा गणेशाराधन, गणेशजी का प्रसन्न होकर त्रैलोक्य-विजय का वरदान और तीन पुर प्रदान करना अथः अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः गृत्समदस्याद्भुत (त्रिपुरासुरस्य) त्रिपुरस्य तपः, गणेशेन दत्तं वरदानञ्च व्यासजी बोले — हे सुरेश्वर! हे कमलजन्मा ब्रह्माजी! उसके बाद गृत्समद ने क्या किया-वह सब मुझ… Read More


श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-37 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ सैतीसवाँ अध्याय गृत्समदमुनि की गणेशाराधना और वरप्राप्ति अथः सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः वरदाख्यानं ब्रह्माजी बोले — [हे व्यासजी!] मुनि गृत्समद ने भ्रमण करते हुए अपने सम्मुख एक वन को देखा, जिसका नाम पुष्पक था। वह वन विविध प्रकार के वृक्षों और लताओं से युक्त तथा प्रचुर पुष्पों से सुशोभित था ॥ १ ॥… Read More


श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-36 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ छत्तीसवाँ अध्याय गृत्समदमुनि के जन्म की कथा अथः षट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः गृत्समदोपाख्यानं व्यासजी बोले — हे कमलासन ब्रह्माजी ! मैंने गणेशतीर्थ के माहात्म्य, रुक्मांगद और कौण्डिन्यपुरवासियों के चरित के विषय में श्रवण किया, तथापि हे ब्रह्मन्! आप मुकुन्दा के मनोहर चरित को मुझसे कहिये ॥ ११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे पुत्र… Read More


श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-35 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ पैंतीसवाँ अध्याय चिन्तामणिक्षेत्रस्थ गणेशतीर्थ में स्नान से राजा रुक्मांगद को दिव्य देह की प्राप्ति तथा उनका माता-पितासहित विनायकलोक को जाना अथः पञ्चत्रिशत्तमोऽध्यायः कादम्बपुर गत वर्णनं व्यासजी बोले — [हे ब्रह्मन्!] देवर्षि नारद के चले जाने पर उन राजा रुक्मांगद ने तब क्या किया ? आप मुझसे इस मनोरम कथा को… Read More


श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-34 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ चौंतीसवाँ अध्याय इन्द्र द्वारा चिन्तामणि-तीर्थ में चिन्तामणि विनायक की स्थापना अथः चतुस्त्रिंशोऽध्यायः चिन्तामणितीर्थ वर्णनं नारदजी बोले — हे नरेन्द्र ! वे जम्भासुर के शत्रु इन्द्र कदम्बवृक्ष के नीचे एक श्रेष्ठ आसन में स्थित होकर, मन का नियन्त्रण करके तथा नासिका के अग्रभाग में दृष्टि को जमाकर षडक्षर मन्त्र का जप… Read More


श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-33 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ तैंतीसवाँ अध्याय गणेशजी के षडक्षरमन्त्र के प्रभाव से इन्द्र को सहस्त्र नेत्रों की प्राप्ति अथः त्रयस्त्रिशतितमोऽध्यायः षडक्षरमन्त्र प्रभावात् इन्द्रस्य दिव्यदेहधारणमं नारदजी बोले — [ हे राजा रुक्मांगद!] वृत्रासुर का वध करने वाले इन्द्र से देवता बोले — हे सौ यज्ञों के कर्ता इन्द्र ! बाहर आओ । हम लोग देवर्षि… Read More


श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-32 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ बत्तीसवाँ अध्याय देवताओं की गौतममुनि से इन्द्र के शापोद्धार हेतु प्रार्थना और गौतममुनि का उन्हें षडक्षर मन्त्र का उपदेश देना अथः द्वात्रिंशोऽध्यायः मन्त्रकथनं नारदजी बोले — [ हे राजा रुक्मांगद !] इन्द्र जब कमलिनी [-की कली ]-में चले गये, तब मैं उनके लोक को गया । वहाँ मैंने बृहस्पति आदि… Read More