भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २३
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — द्वितीय भाग)
अध्याय – २३
विक्रमस्य यज्ञकरणम्, चंद्रलोकं प्रतिगमनम्, भर्तृहरिवृत्तान्त

व्यास जी बोले-विशाला नगरी में स्थित महर्षि वृन्द ने इसे सुनकर केदार कुण्ड में स्नान करके शिव जी की मानसिक अर्चना प्रारम्भ की । इसी प्रकार समाधिनिष्ठ होकर एक वर्ष का समय व्यतीत किया कि उसी समय राजा विक्रमादित्य वहाँ आकर उन समाधिस्थ महर्षियों की उत्तम वाणी द्वारा स्तुति करने लगे । पश्चात् वे मुनिगण सूत जी के पास जाकर कहने लगे कि आपने जिसकी कथा का वर्णन किया है, वही राजा यहाँ आया हुआ है ।om, ॐ यदि आप आज्ञा प्रदान करें तो हम लोग राजा के अश्वमेध यज्ञ का आरम्भ करायें, किन्तु, आप चक्रतीर्थ में चलकर वहीं ध्यान करें । उसे स्वीकार कर सूत जी ने उनके साथ पुनः उसी स्थान पर आकर अश्वमेध नामक उस महायज्ञ का अनुष्ठान सविधान सुसम्पन्न कराया।
पूर्व में कपिला स्थान, दक्षिण में सेतुबन्धन, पश्चिम में सिन्धु नदी, और उत्तर में बदरिकाश्रम के जंगल तक शीघ्रता से जाकर वह अश्व क्षिप्रा नदी के तट पर पहुँच गया। वहाँ अपने कलेवर (देह) को अग्नि में डालकर स्वयं स्वर्गलोक चला गया। राजा के उस यज्ञ समारोह में सभी देवगण अपनी पत्नियों के समेत आये थे। केवल चन्द्रमा का आगमन वहाँ नहीं हुआ था, अतः अन्य मनस्क होकर राजा भाँति-भाँति के दान देने के उपरांत वैताल के साथ चन्द्रलोक में गये। उससे चन्द्रमा का सुख प्राप्त हुआ।

उन्होंने कहा-राजन् ! महाभाग ! इस भीषण कलि के आगमन से पृथ्वी तल पर मेरी गति नहीं होती है, इसीलिए मैं तुम्हारे समीप न आ सका। पश्चात् अमृतमय जल प्रदान कर चन्द्रमा वहां अन्र्ताहत हो गये । यह बात इन्द्र को विदित हुई । इन्द्र ने ब्राह्मण का रूप धारण कर उसकी याचना को । राजा ने उसे इन्द्र को दे दिया। अनन्तर इन्द्र स्वर्ग चले आये । उसे इन्द्र को प्रदान करने के नाते राजा की आयु लक्ष के समान हो गई। उस समय जयन्त नामक किसी ब्राह्मण ने तप द्वारा इन्द्र से उसी फल की प्राप्ति करके स्वर्ग को प्रस्थान किया।

जयन्त ने राजा भर्तृहरि से एक लक्ष सुवर्ण की मुद्रा ग्रहणकर उनसे उसका वर्णन किया । भर्तृहरि उसका उपभोग करके योग की तैयारी कर वन वन चले गये । पश्चात् राजा विक्रमादित्य सौ वर्ष तक उस राज्य का निष्कटंक उपभोग करके स्वर्ग चले गये । शौनकादि ऋषिगण ने राजा को स्वर्गीय जानकर सूत के पास जाकर प्रणाम पूर्वक उनसे कहा-इस समय मुख्य धर्म की चर्चा कीजिये । सूत जी ने पुनः उन्हें पुराणों का श्रवण कराया। उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर सौ वर्ष तक पाँच लक्ष श्लोकों का उन्हें अध्ययन कराया। मुनिवृन्द उन्हें श्रवण करके हर्ष निमग्न होते हुए अपने-अपने गृह चले गये ।
(अध्याय २३)

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