भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ९४ से ९५
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – ९४ से ९५
एक वैश्य तथा ब्राह्मणकी कथा, सूर्यमन्दिर में पुराण-वाचन एवं भगवान् सूर्यको स्नानादि करानेका फल

ब्रह्माजी बोले — दिण्डिन् ! मैं आपको पितामह और कुमार कार्तिकेय का एक आख्यान सुना रहा हूँ, जो पुण्यदायक, पापनाशक तथा कल्याणकारी है । एक बार सभी लोकों के रचयिता पितामह सुखपूर्वक बैठे थे, उनके पास श्रद्धा-भक्ति समन्वित हो कार्तिकेय ने आकर प्रणाम किया और कहा —om, ॐविभो ! आज में दिवाकर भगवान् सूर्यदेव को दर्शन करने के लिये गया था । प्रदक्षिणा करके मैंने उनकी पूजा की तथा परमभक्ति और श्रद्धा से मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और वहीं बैठ गया । वहाँ मैंने एक महान् आश्चर्य की बात देखी —
स्वर्णजटित छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त श्रेष्ठ वैदूर्यादि मणियों एवं मुक्ताओंसे सुशोभित विचित्र विमानसे आ रहे एक पुरुषको देखकर भगवान् दिवाकर सहसा आसनसे उठ खड़े हुए। उन्होंने सामने आये हुए उस पुरुषको अपने दाहिने हाथसे पकड़कर अपने सामने बैठाया और उसके सिरको सूँघा तथा उसका पूजन किया, तदनन्तर समीपमें बैठे हुए उस पुरुषसे भगवान् सूर्यने कहा —
‘हे भद्र ! आपका स्वागत है । आपका हम सबपर बड़ा प्रेम है । आपने बहुत आनन्द दिया । जबतक महाप्रलय नहीं होता, तबतक आप मेरे समीप रहें । उसके पश्चात् उस स्थानको जायें, जहाँ ब्रह्मा स्वयं स्थित हैं ।’ इसी बीच भगवान् सूर्यके सामने एक श्रेष्ठ विमानपर आसीन दूसरा पुरुष आया । उसका भी सूर्यभगवान् ने उसी प्रकार आदर किया और उसे भी विनम्र भावसे वहीं बैठाया । देवशार्दूल ! भगवान् सूर्य के द्वारा की गयी उन दोनों की पूजा देखकर मेरे मनमें बड़ा कौतूहल उत्पन्न हो गया, अतः मैंने भगवान् भास्करसे पूछा – ‘देव ! पहले जो यह मनुष्य आपके पास आया है और जिसे आपने अधिक संतुष्ट किया है, इसने कौन-सा ऐसा पुण्यकर्म किया है, जो इसकी आपने स्वयं ही पूजा की है ? इस विषयको लेकर मेरे हृदय में विशेषरूप से कौतूहल उत्पन्न हो गया है । उसी प्रकार से आपने दूसरे मनुष्यकी भी पूजा की है । ये दोनों सब प्रकारसे पुण्यकर्म करनेवाले उत्तम जनों में भी श्रेष्ठ मनुष्य हैं । आप तो सदा ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवताओं के द्वारा भी अर्चित, पूजित होते हैं, फिर आपके द्वारा ये दोनों किस कारण पूजित हुए ? देवेश ! मुझे आप इसका रहस्य बतायें ।’
भगवान् सूर्यने कहा — महामते ! आपने इनके कर्म के विषय में बहुत अच्छी बात पूछी है, जिस कारणसे ये मेरे पास आये हैं, उसे आप श्रवण करें —
पृथ्वीतलपर अयोध्या नामकी एक प्रसिद्ध नगरी है, जो मेरे अंश से उत्पन्न राजाओं द्वारा अभिरक्षित है । उस अयोध्या नामक नगरी में धनपाल नामका एक श्रेष्ठ वैश्य रहता था । उस पुरी में उसने एक दिव्य सूर्यमन्दिर बनवाया और बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बुलाकर उनकी पूजा की । इतिहास-पुराण के वाचकॉ की विशेषरूप से पूजा की और उनसे पुराण-श्रवण कराने की प्रार्थना की तथा कहा — द्विजश्रेष्ठ ! इस मन्दिर में यह चारों वर्णों का समूह पुराण-श्रवण करनेका इच्छुक है, अतः आप पुराणश्रवण करायें, जिससे भगवान् सूर्य मेरे लिये सात जन्म तक वर देनेवाले हों । आप एक वर्ष तक मेरी दी हुई वृत्तिको ग्रहण करें । उन्होंने वैश्य धनपाल के आग्रह को स्वीकार कर लिया । परंतु छः मास में ही वैश्य धनपाल कालधर्म को प्राप्त हो गया । हे कुमार ! वही यह वैश्य है । मैंने इसीको लानेके लिये विमान भेजा था । पुण्य आख्यान को कहने या सुनने से जो फल एवं तुष्टि प्राप्त होती है, यह उसीका फल है । गन्ध-पुष्पादि उपचा से पूजन करने पर मेरे हृदय में वैसी प्रसन्नता उत्पन्न नहीं होती जैसी पुराण सुनने से होती है। कुमार ! गौ, सुवर्ण तथा स्वर्णजटित वस्त्रों, ग्रामों तथा नगरोंका दान देनेसे मुझे इतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी प्रसन्नता इतिहास-पुराण सुनने-सुनाने से होती है । मुझे अनेक खाद्य-पदार्थों द्वारा किये गये श्राद्धों से वैसी प्रसन्नता नहीं होती, जैसी पुराण-वाचन से होती है । सुरश्रेष्ठ ! इससे अधिक और क्या कहूँ ? इस रहस्ययुक्त पवित्र आख्यान के वाचन के बिना मुझे अन्य कुछ भी प्रिय नहीं है ।
नरोत्तम ! यह जो दूसरा ब्राह्मण यहाँ आया है, यह भी उसी श्रेष्ठ अयोध्या नगरी में उत्तम कुलका ब्राह्मण था । एक बार यह परम श्रद्धा-भक्ति से समन्वित होकर धर्मकी उत्तम कथा को सुननेके लिये गया था । वहाँ पर उसने भक्तिपूर्वक उत्तम पवित्र आख्यान को सुनकर उन महात्मा वाचक की प्रदक्षिणा की । तत्पश्चात् यह ब्राह्मण उस परम तेजस्वी वाचक को दक्षिणा में एक माशा स्वर्ण दान देकर परम आनन्दित हुआ । यही इसका पुण्य है । जो यह मेरे द्वारा सम्मानित हुआ है यह उसी पुण्यकर्मका परिणाम है । श्रद्धा-भक्ति-समन्वित जो व्यक्ति वाचक की पूजा करता है, उससे मैं भी पूजित हो जाता हूँ ।

जो मनुष्य अच्छे-से-अच्छे भोज्य पदार्थो के द्वारा वाचक को परितृप्त करता है, उससे मेरी भी संतुष्टि हो जाती है । मेरी संताने यम, यमी, शनि, मनु तथा तपती मुझे उतने प्रिय नहीं हैं, जितना मुझे कथावाचक प्रिय है ।‘न यमो न यमी चापि न मन्दो न मनुस्तथा । तपती न तथान्विष्टा यथेष्टो वाचको मम ॥’ (ब्राह्मपर्व ९४ । ४५)
वाचक के संतुष्ट होने पर सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं । क्योंकि हे देवसेनापते ! सबसे पहले संसार के द्वारा पूज्य जो मेरा मुख था, उसी मुखसे संसारका कल्याण करनेके निमित्त सभी इतिह्मस-पुराणादि ग्रन्थ प्रकट हुए । महामते ! मुझे पुराण वेदों से भी अधिक प्रिय हैं । जो श्रद्धाभावसे नित्य इन्हें सुनते हैं और वाचक को वृत्ति प्रदान करते हैं, वे परमपद प्राप्त करते हैं । सुव्रत ! धर्म-अर्थ-काम तथा मोक्ष—पुरुषार्थ चतुष्टयकी उत्तम व्याख्याके लिये मैंने ये इतिहास-पुराण बनाये हैं । वेद का अर्थ अत्यन्त दुर्जेय है । अतएव महामते ! इनको जाननेके लिये ही मैंने इतिहास-पुराणों की रचना की है । जो मनुष्य प्रतिदिन पुराण-श्रवणका उत्तम कार्य करवाता है, वह सूर्यदेवसे ज्ञान प्राप्तकर परमपदको प्राप्त करता है । वाचकको जो दक्षिणा देता है, वह सूर्यदेवके लोकों को प्राप्त करता है । हे सुरश्रेष्ठ ! इसमें आश्चर्य क्या है ? जैसे देवताओंमें इन्द्र श्रेष्ठ हैं, शस्त्रों में वज्र श्रेष्ठ है और जैसे तेजस्वियोंमें अग्नि, नदियों में सागर श्रेष्ठ माना गया है, वैसे ही सभी ब्राह्मणोंमें इतिहास-पुराण-वाचक ब्राह्मण श्रेष्ठ है । जो मनुष्य भक्तिपूर्वक पुराण-वाचकका पूजन करता है, उसके उस पुण्यकर्म द्वारा सम्पूर्ण जगत् पूजित हो जाता है । ब्रह्माजी ने पुनः कहा — दिण्डिन् ! देवदेवेश्वर भगवान् सूर्यके मन्दिरमें जो मनुष्य धर्मका श्रवण करता है या कराता है, उसके पुण्यसे वह परम गतिको प्राप्त करता है ।

जो पुरुष भगवान् सूर्यको तीन बार प्रदक्षिणा करके भूमिपर मस्तक झुकाकर सूर्यनारायणको प्रणाम करता है, वह उत्तम गतिको प्राप्त होता है । जो मनुष्य जूता पहनकर मन्दिर में प्रवेश करता है, वह तामिस्र नामक भयंकर नरकमें जाता है । जो सूर्यदेवके स्नानार्थ घृत, दूध, मधु, इक्षुरस अथवा गङ्गादि पवित्र नदियोंका उतम जल देते हैं, वे सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्तकर सूर्यमण्डलको प्राप्त करते हैं । अभिषेकके समय जो उनका भक्तिपूर्वक दर्शन करते हैं, उन्हें अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है और अन्त में वे शिवलोकको जाते हैं । सूर्यभगवान् को ऐसे स्थानपर स्नान कराना चाहिये, जहाँ स्नानका जल आदि किसीसे लाँघा न जा सके । जलका लङ्घन हो जानेपर अशुभ होता है ।
(अध्याय ९४-९५)

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