श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -060
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
साठवाँ अध्याय
मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रहों एवं सूर्य के माहात्म्य का वर्णन
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे षष्टितमोऽध्यायः
सूर्यप्रभावर्णनं

सूतजी बोले —  सूर्य अग्नि के रूप में पढ़ा जाता है और चन्द्रमा को जल कहा गया है। शेष [ भौम आदि ] पाँच ग्रहों को ईश्वर तथा इच्छा के अनुसार भ्रमण करने वाला जानना चाहिये ॥ १ ॥ [ हे ऋषियो ! ] मैं शेष ग्रहों की प्रकृति भलीभाँति बताता हूँ, आप लोग सुनिये। भौम (मंगल) ग्रह को देवताओं का सेनापति स्कन्द कहा जाता है। ज्ञानी लोग बुध को नारायण देव कहते हैं । हे द्विजश्रेष्ठो ! मन्द गति वाला महाग्रह शनैश्चर समस्त लोकों का स्वामी तथा लोकप्रभु साक्षात् यम है। देवताओं और असुरों के गुरु भानुमान् महाग्रह बृहस्पति तथा शुक्र प्रजापति पुत्र कहे गये हैं। आदित्य ही सम्पूर्ण त्रैलोक्य का मूल है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २-५ ॥

देवता, असुर तथा मनुष्य सहित सम्पूर्ण जगत् इसी [सूर्य ] से उत्पन्न होता है। वे सूर्य रुद्र, इन्द्र, उपेन्द्र, चन्द्रमा, श्रेष्ठ ब्राह्मणों, अग्नि एवं देवताओं —  इन सब द्युतिसम्पन्न देवों की द्युति हैं। उनका जो सम्पूर्ण तेज है, वह सार्वलौकिक है। वे सबकी आत्मा, सभी लोकों के ईश्वर, महादेव और प्रजापति हैं। सूर्य ही तीनों लोकों के ईश, सबके कारणस्वरूप एवं परम देवता हैं। उन्हीं से सब कुछ उत्पन्न होता है और उन्हीं में विलीन हो जाता है ॥ ६-८ ॥ लोकों के भाव तथा अभाव पूर्वकाल में आदित्य से ही निकले थे। हे विप्रो ! उत्तम प्रभा वाला दीप्तिमान् सूर्य [ नामक ] ग्रह अविज्ञेय है ॥ ९ ॥

क्षण, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, मास, संवत्सर (वर्ष), ऋतु तथा युग इन्हीं सूर्य से बार-बार उत्पन्न होते हैं और इन्हीं में समाप्त होते हैं। इसलिये सूर्य के बिना यह कालगणना नहीं होती है। काल के बिना न नियम हो सकता है, न दीक्षा हो सकती है और न दैनिक कृत्य ही हो सकता है। [इनके बिना ] ऋतुओं का विभाजन, पुष्प, मूल तथा फल कैसे हो सकते हैं ? धान्य की उत्पत्ति कैसे सम्भव है और तृण तथा औषधियाँ भी कैसे हो सकती हैं ? जगत्‌ को तपाने वाले रुद्ररूप भास्कर के बिना इस लोक में तथा स्वर्ग में प्राणियों के व्यवहार का अभाव हो जायगा। वे ही काल, अग्नि, द्वादश आत्मा तथा प्रजापति हैं ॥ १०-१४ ॥

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ये ही सूर्य चराचरसहित त्रैलोक्य को प्रकाश देते हैं। ये ही तेजों की राशि, सम्पूर्ण स्वरूप वाले तथा सार्वलौकिक हैं । उत्तम मार्ग का आश्रय लेकर ये [सूर्य] ही इस जगत्‌ को पार्श्वभाग से, ऊपर से, नीचे से, सभी ओर से दिन-रात ताप प्रदान करते हैं । जिस प्रकार घर में रखा हुआ प्रभा करने वाला दीपक पार्श्वभाग में, ऊपर तथा नीचे समान रूप से अन्धकार का नाश करता है, उसी तरह हजार किरणों वाले ग्रहों के राजा एवं जगत् के स्वामी सूर्य [अपनी] किरणों से सारे जगत् को सभी ओर से प्रकाशित करते हैं ॥ १५–१८ ॥

मैं सूर्य की जिन हजार किरणों को पहले बता चुका हूँ, उनमें सात श्रेष्ठ किरणें ग्रहों को उत्पन्न करने वाली हैं। वे सुषुम्ना, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, सन्नद्ध, सर्वावसु और स्वराट् [नाम वाली ] कही गयी हैं । सूर्य की सुषुम्ना [नामक] रश्मि दक्षिण राशि की वृद्धि करती है। इस सुषुम्ना का गमन पार्श्व, ऊपर तथा नीचे सभी ओर कहा गया है। सामने की ओर जो हरिकेश [ रश्मि ] है, उसे नक्षत्रों की योनि कहा जाता है। विश्वकर्मा [नामक ] रश्मि दक्षिण में बुध को विकसित करती है। पीछे की ओर जो विश्वव्यचा [ नामक रश्मि ] है, उसे विद्वानों ने शुक्र की योनि कहा है। जो सन्नद्ध [ नामक ] रश्मि है, वह मंगलकी योनि है। छठी जो सर्वावसु रश्मि है, वह बृहस्पतिकी योनि है । इसके बाद स्वराट् रश्मि शनैश्चरको पोषित करती है । इस प्रकार सूर्यके ही प्रभावसे सभी नक्षत्र, ग्रह और तारे अन्तरिक्ष में दिखायी देते हैं और यह सम्पूर्ण जगत् दिखायी देता है। चूँकि वे नष्ट नहीं होते, इसलिये उन्हें नक्षत्र कहा गया है ॥ १९–२६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘सूर्यप्रभाववर्णन’ नामक साठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६० ॥

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