श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -066
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
छाछठवाँ अध्याय
इक्ष्वाकुवंशी राजाओं की कथा तथा ययातिवंश – वर्णन
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे षट्षष्टितमोऽध्याय
इक्ष्वाकु वंश वर्णनं

सूतजी बोले —  [ हे द्विजो !] त्रिधन्वा ने देवदेव तण्डी की कृपा से प्रयत्नपूर्वक हजार अश्वमेधयज्ञों का फल प्राप्त करके सभी देवताओं से नमस्कृत होकर महान् गणाधिपपद प्राप्त कर लिया। उन त्रिधन्वा के पुत्र विद्वान् राजा त्रय्यारुण थे । उन [ त्रय्यारुण ] -का सत्यव्रत नामक महाबली पुत्र हुआ। उसने अमित तेजवाले विदर्भ देश के राजा को मारकर पाणिग्रहण के मन्त्रों के पूर्ण होने से पहले ही उसकी पत्नी का हरण कर लिया। तब राजा त्रय्यारुण ने उस अधर्म से युक्त [अपने] पुत्र का त्याग कर दिया ॥ १-४ ॥ 1

हे द्विजो! तत्पश्चात् [पिता के द्वारा] त्यक्त उस [ सत्यव्रत] ने पिता से कहा —  ‘मैं कहाँ जाऊँ ?’ तब पिता ने उससे कहा — ‘तुम चाण्डालों के साथ रहो’ ॥ ५ ॥

इस प्रकार कहा गया वह [ सत्यव्रत] पिता के आदेश से नगर से निकल गया और पिता के द्वारा त्यक्त वह बुद्धिमान् सत्यव्रत चाण्डालों के निवासस्थान के समीप रहने लगा और उसके पिता वन में चले गये। पूर्वकाल में वसिष्ठ के कोप के कारण वह पुण्यात्मा राजा सत्यव्रत सभी लोकों में पराक्रमी त्रिशंकु – इस नाम से विख्यात हुआ।2  उसके बाद महातेजस्वी मुनि विश्वामित्र ने त्रिशंकु को वर प्रदानकर उसे पिता राज्य पर अभिषिक्त करके उससे यज्ञ कराया था। देवताओं तथा वसिष्ठ के निषेध करने पर भी ऐश्वर्यशाली विश्वामित्र ने उसे सशरीर स्वर्ग भेज दिया था ॥ ६-९१/२

कैकयवंश में उत्पन्न उसकी सत्यव्रता नामक भार्या ने निष्पाप हरिश्चन्द्र नामक पुत्र को जन्म दिया । हरिश्चन्द्र का रोहित नामक पराक्रमी पुत्र था। रोहित का पुत्र हरित था । हरित का पुत्र धुंधु कहा जाता है। धुंधु के दो पुत्र हुए — विजय और सुतेज । उस [ विजय ] ने समस्त क्षत्रियों को जीत लिया था, अतः उसे विजय कहा गया है । उसका पुत्र रुचक महान् धार्मिक राजा था । रुचक का पुत्र वृक था। उस [वृक] – से बाहु उत्पन्न हुआ । उसका पुत्र सगर हुआ; वह परम धार्मिक राजा था ॥ १०–१४ ॥ सगर की भी प्रभा तथा भानुमती [नामक ] दो भार्याएँ थीं। उन दोनों ने पूर्वकाल में पुत्र की कामना से अग्निसदृश और्व ऋषि की आराधना की थी; और्व ने प्रसन्न होकर उन्हें यथेष्ट उत्तम वर प्रदान किया। उनमें से एक [ रानी] ने साठ हजार तथा दूसरी ने वंश को बढ़ाने वाले एक पुत्र को माँगा था। प्रभा ने बहुत पुत्रों को प्राप्त किया और भानुमती ने असमंजस नामक एक पुत्र को प्राप्त किया। उसके बाद प्रभा ने जिन साठ हजार पुत्रों को जन्म दिया था, वे पृथ्वी को खोदते हुए कपिलरूप विष्णु के हुंकाररूपी बाणों से दग्ध हो गये ॥ १५–१८ ॥

असमंजस के पुत्र अंशुमान् नाम से विख्यात हुए। उन [अंशुमान्]-के पुत्र दिलीप थे और दिलीप से भगीरथ हुए, जिन्होंने तपस्या करके भागीरथी गंगा का अवतरण कराया। भगीरथ के श्रुत नामक पुत्र हुए। उन [श्रुत]-के पुत्र नाभाग हुए, जो शिवभक्त तथा प्रतापशाली थे। उन [नाभाग]-के अम्बरीष नामक पुत्र हुए। उन [ अम्बरीष ] – से सिन्धुद्वीप उत्पन्न हुए । नाभागपुत्र अम्बरीष के द्वारा भुजाओं से भली-भाँति पालित की गयी पृथ्वी [दैहिक, दैविक, भौतिक] तीनों प्रकार के तापों से पूर्णरूप से विहीन हो गयी थी ॥ १९-२२ ॥

उन सिन्धुद्वीप के अयुतायु नामक पराक्रमी पुत्र हुए। अयुतायु के ऋतुपर्ण नामक पुत्र हुए; वे बुद्धिमान् तथा महायशस्वी थे । वे बलवान् राजा [ ऋतुपर्ण] नल के सखा और दिव्य द्यूतक्रीड़ा मर्मज्ञ थे। पुराणों में दृढव्रत वाले दो नल प्रसिद्ध हैं । एक तो वीरसेन का पुत्र था और दूसरा इक्ष्वाकुकुल में उत्पन्न हुआ था, ऋतुपर्ण के पुत्र राजा सार्वभौम हुए और उनके पुत्र सुदास हुए, वे इन्द्र के समान थे। सुदास के पुत्र राजा सौदास कहे गये हैं। उनका नाम मित्रसह था, किंतु वे कल्माषपाद  नाम से प्रसिद्ध हुए। महातेजस्वी वसिष्ठ ने कल्माषपाद के क्षेत्र में इक्ष्वाकु कुल की वृद्धि करने वाले अश्मक को उत्पन्न किया। उत्तरा के गर्भ से अश्मक के मूलक नामक पुत्र उत्पन्न हुए। वे परशुराम के भय से स्त्रियों से घिरे रहते थे और वन में अपनी रक्षा की इच्छा करते हुए उत्तम नारीकवच धारण किये रहते थे। मूलक के शतरथ नामक पुत्र हुए, वे धर्मात्मा राजा थे। उन शतरथ से बलशाली राजा इलविल उत्पन्न हुए। इलविल के पुत्र वृद्धशर्मा थे, जो ऐश्वर्यसम्पन्न तथा प्रतापशाली थे । उनके पुत्र विश्वसह थे, जिन्हें पितृकन्या ने जन्म दिया था। उनके पुत्र दिलीप हुए; वे खट्वांग नाम से प्रसिद्ध हुए, जिन्होंने एक मुहूर्त का जीवन प्राप्त करके स्वर्ग से इस लोक में आकर [अपनी] बुद्धि एवं सत्य के द्वारा तीनों अग्नियों तथा तीनों लोकों को जीत लिया था। उनके पुत्र दीर्घबाहु हुए तथा उनसे रघु उत्पन्न हुए। उन रघु से अज नामक पुत्र उत्पन्न हुए और उन [ अज] से पराक्रमी दशरथ उत्पन्न हुए। उन दशरथ से ऐश्वर्यशाली, इक्ष्वाकुवंश को बढ़ाने वाले, वीर, धर्मज्ञ तथा लोकप्रसिद्ध राम और लक्ष्मण, भरत तथा महाबली शत्रुघ्न उत्पन्न हुए ॥ २३-३५ ॥

उनमें राम श्रेष्ठ, महातेजस्वी तथा महान् ओजस्वी थे। उन धर्मज्ञ राम ने युद्ध में रावण का वध करके तथा यज्ञों के द्वारा यजन करके दस  हजार वर्षों तक राज्य किया था। राम के कुश नाम से एक प्रसिद्ध पुत्र उत्पन्न हुए और दूसरे लव उत्पन्न हुए, जो परम भाग्यशाली, सत्यनिष्ठ और सद्बुद्धि वाले थे। कुश से अतिथि उत्पन्न हुए। उन [ अतिथि] – के पुत्र निषेध थे। निषध से नल उत्पन्न हुए और उन [ नल] से नभ उत्पन्न हुए । नभ से पुण्डरीक नामक  पुत्र उत्पन्न हुए और उनसे क्षेमधन्वा उत्पन्न कहे गये हैं। उनके देवानीक नामक वीर तथा प्रतापी पुत्र हुए। उनके पुत्र अहीनर थे तथा उनके पुत्र सहस्राश्व थे । उनसे कल्याणमय चन्द्रावलोक हुए और फिर उनसे तारापीड हुए। उन [ तारापीड] – के पुत्र चन्द्रगिरि हुए और उनसे भानुचन्द्र हुए। उनसे श्रुतायु उत्पन्न हुए, उन्हें बृहद्बल कहा गया है, जिन महा-तेजस्वी को महाभारत के युद्ध में सुभद्रापुत्र [ अभिमन्यु ] – ने मार डाला था । ये सब प्रायः इक्ष्वाकुवंश के उत्तराधिकारी राजा कहे गये हैं। इस वंश के प्रधान राजाओं का वर्णन मुख्यरूप से कर दिया गया। ये सब शिव का ज्ञान प्राप्त करके परमेश्वर का अर्चनकर अपने ज्ञान के अनुसार विधिपूर्वक यज्ञों के द्वारा यजन करके स्वर्ग चले गये; इनमें कुछ महात्मा तथा मुक्त आत्मा वाले योगी हुए। [राजा] नृग एक ब्राह्मण के शाप से गिरगिट की योनि को प्राप्त हो गये थे ॥ ३६-४५ ॥

धृष्ट के तीन पुत्र थे — धृष्टकेतु, यमबाल तथा पराक्रमी रणधृष्ट; नामक वे सब परम धार्मिक थे ॥ ४६ ॥

शर्याति के आनर्त नामक पुत्र हुए और सुकन्या नामक पुत्री हुई। आनर्त के प्रतापशाली पुत्र रोचमान उत्पन्न हुए । रोचमान के पुत्र रेव हुए और रेव से रैवत हुए जो ककुद्मी इस दूसरे नाम से भी प्रसिद्ध थे, वे सौ पुत्रों वाले रेव के ज्येष्ठ पुत्र थे, जिनकी कन्या रेवती थी; वह राम ( बलराम ) – की पत्नी कही गयी है। नरिष्यन्त के एक जितात्मा तथा महाबली पुत्र था। नाभाग से अम्बरीष हुए, वे विष्णु भक्त एवं प्रतापशाली थे। उनके पुत्र ऋत हुए, जो ऐश्वर्यशाली तथा धर्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ थे। उनके पुत्र कृत हुए; उनके पुत्र सुधर्मा हुए, जो पृषित नाम से विख्यात हुए । करूष के पुत्र कारूष हुए, वे सब प्रसिद्ध कीर्ति वाले थे। पृषित ने [ अपने] गुरु की गाय का वध करके महान् पाप किया; वे च्यवन के शाप से शूद्रत्व को प्राप्त हुए थे — यह प्रसिद्ध है। दिष्ट के पुत्र नाभाग हुए। उन [नाभाग ] से भलंदन हुए, भलंदन के पुत्र अजवाहन हुए; वे पराक्रमी राजा थे। [हे ऋषियो!] मैंने संक्षेप में विशाल भुजाओं वाले मनुपुत्रों का तथा इक्ष्वाकु के पुत्र, पौत्र आदि का वर्णन कर दिया; अब मैं आप लोगों से ऐल वंश का वर्णन करता हूँ ॥ ४७–५४ ॥

हे द्विजो ! इला का पुरूरवा नामक पुत्र रुद्रभक्त तथा प्रतापी था। उसने उत्तर में यमुना के तट पर मुनियों के द्वारा सेवित अत्यन्त पवित्र देश प्रयाग में निष्कंटक राज्य किया। प्रतिष्ठानपुर का स्वामी वह पुरूरवा प्रतिष्ठानपुर में प्रतिष्ठित हुआ। उसके सात पुत्र हुए। वे सब महान् तेजस्वी, गन्धर्वलोक में प्रसिद्ध, शिवभक्त तथा महाबली थे। आयु, मायु, अमायु, विश्वायु, वीर्यवान्, श्रुतायु, शतायु — ये उर्वशी के दिव्य पुत्र थे । आयु के पाँच महान् ओज वाले तथा वीर पुत्र हुए; स्वर्भानु की पुत्री प्रभा से वे राजा उत्पन्न हुए थे। उनमें पहला [ पुत्र] नहुष था, जो धर्मज्ञ एवं लोकप्रसिद्ध था । नहुष के छः पुत्र हुए । इन्द्र के समान तेज वाले तथा महान् ओजस्वी वे सब पितृकन्या विरजा से उत्पन्न हुए थे । यति, ययाति, संयाति, आयाति, अन्धक, विजाति — ये छ: पुत्र थे; सब-के-सब प्रसिद्ध कीर्ति वाले थे । उनमें यति ज्येष्ठ था और ययाति उससे कनिष्ठ था । ज्येष्ठ यति मोक्ष का इच्छुक था और वह ब्रह्मस्वरूप हो गया। उन [शेष ] पाँचों में ययाति महान् बल तथा पराक्रम से सम्पन्न था। उसने उशना (शुक्राचार्य) – की पुत्री देवयानी को और वृषपर्वा की पुत्री आसुरी शर्मिष्ठा को भार्यारूप में प्राप्त किया था ॥ ५५–६४ ॥

देवयानी ने यदु और तुर्वसु को उत्पन्न किया; वे दोनों ही उत्तम कर्म वाले, प्रशंसनीय तथा विद्या में प्रवीण थे । वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा ने द्रुह्य, अनु एवं पूरु को जन्म दिया। उन ययाति के द्वारा सन्तुष्ट किये गये प्रतापी विप्रेन्द्र शुक्र ने प्रसन्न होकर उन ययाति को दो अक्षय महान् तरकस और अत्यन्त चमकीला, सुन्दरतापूर्वक निर्मित, स्वर्णमय, दिव्य तथा मन के समान वेगवाले घोड़ों से जुता हुआ रथ प्रदान किया, जिससे वह कन्या को [ अपने घर] लाया था। उसने उस रथ से छ: महीने के भीतर ही [सम्पूर्ण ] पृथ्वी को जीत लिया था । ययाति युद्ध में देवताओं, दानवों तथा मनुष्यों से अजेय था। वह शिवभक्त, पुण्यात्मा, धर्मनिष्ठ, सामंजस्य रखने वाला, यज्ञ करने वाला, क्रोध को जीत लेने वाला तथा सभी प्राणियों पर दया करने वाला था ॥ ६५–६९१/२

वह [रथ] सभी कौरवों का तबतक उत्तम रथ था, जबतक कुरुवंशी महाराज जनमेजय थे। बुद्धिमान् [ऋषि] गर्ग के शाप के कारण पुरुवंश में उत्पन्न परीक्षित् पुत्र राजा जनमेजय का वह रथ विनाश को प्राप्त हो गया। उन राजा जनमेजय ने गर्ग के पुत्र बालक अक्रूर को मार डाला था, जिससे उन्हें ब्रह्महत्या लग गयी। तब रुधिर की गन्ध वाले वे राजर्षि इधर-उधर भागने लगे । नगरवासियों ने उनका परित्याग कर दिया और उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिल सकी। जब दुःख से संतप्त उनको कहीं भी ज्ञान प्राप्त नहीं हो सका, तब वे व्यथित होकर शौनक ऋषि की शरण में गये । उदार बुद्धि वाले वे मुनि इन्द्रेति नाम से विख्यात थे । हे श्रेष्ठ द्विजो ! इन्द्रेति ने उन राजा जनमेजय को पवित्र करने के लिये उनसे अश्वमेधयज्ञ का यजन कराया ॥ ७०-७६ ॥ तदनन्तर वे महायशस्वी जनमेजय रुधिर की गन्ध से तथा ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो गये और उस यज्ञ के अवभृथस्नान के समय वह दिव्य तथा उत्तम रथ लुप्त हो गया । तदनन्तर इन्द्र ने प्रसन्न होकर उस वंश से परिभ्रष्ट उस रथ को चेदिदेश के राजा वसु को दे दिया। पुन: उनसे बृहद्रथ ने प्राप्त किया। उसके बाद कौरवनन्दन भीम ने जरासंध को मारकर वह उत्तम रथ वासुदेव को प्रेमपूर्वक प्रदान कर दिया ॥ ७७-७९ ॥

सूतजी बोले —  हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! नहुष के पुत्र ययाति ने अपने पुत्र पुरु को [राज्य पर] अभिषिक्त किया था; क्योंकि उस पुरु ने उनका उपकार किया था। कनिष्ठ पुत्र पुरु का अभिषेक करने की इच्छा वाले उन राजा से प्रमुख ब्राह्मणों तथा अन्य नागरिको ने यह वचन कहा था — ‘हे प्रभो ! शुक्राचार्य के नाती तथा देवयानी के पुत्र ज्येष्ठ यदु का अतिक्रमण करके छोटा भाई [ पुरु] राज्य का अधिकारी कैसे हो सकता है ? हम लोग आपको यह समझा रहे हैं कि आप धर्म का पालन करें’ ॥ ८०–८३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘इक्ष्वाकुवंशवर्णन ‘ नामक छाछठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६६ ॥

Content is available only for registered users. Please login or register

 

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.