श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम् – अध्याय २ ॐ गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम् भक्ति को दुःख दूर करने के लिये नारदजी का उद्योग नारदजी ने कहा — बाले ! तुम व्यर्थ ही अपने को क्यों खेद में डाल रही हो ? अरे ! तुम इतनी चिन्तातुर क्यों हो ? भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों का चिन्तन करो,… Read More


श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम् – अध्याय १ ॐ गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय श्रीमद्भागवतमाहात्म्य देवर्षि नारद की भक्ति से भेंट (अनुष्टुप्) सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे । तापत्रविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः ॥ १ ॥ सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण को हम नमस्कार करते हैं, जो जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश के हेतु तथा आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तीनों प्रकार के तापों… Read More


श्रीमद्भागवत-सप्ताह की आवश्यक विधि 1. श्रीमद्भागवत-माहात्म्य 2. श्रीमद्भागवत – श्रीशुकदेवजी को नमस्कार 3. श्रीमद्भागवत की पूजनविधि 4. श्रीमद्भागवत विनियोग, न्यास एवं ध्यान पुराण में श्रीमद्भागवत के सप्ताहपारायण तथा श्रवण की बड़ी भारी महिमा बतलायी गयी है, अतः यहाँ श्रीमद्भागवत-प्रेमियों के लिये संक्षेप में सप्ताह-यज्ञ की आवश्यक विधि का दिग्दर्शन कराया जाता है ।… Read More


॥ देवी-देवताओं के गायत्री मन्त्र ॥ सरस्वती गायत्री मन्त्रः- “ॐ ऐं वाग्देव्यै विद्महे कामराजाय धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥” षडङ्गन्यासः- ॐ ऐं वाग्देव्यै हृदयाय नमः ॥ १ ॥ ॐ विद्महे शिरसे स्वाहा ॥२॥ ॐ कामराजाय शिखायै वषट् ॥ ३ ॥ ॐ धीमहि कवचाय हुम् ॥ ४ ॥ ॐ तन्नो देवी नेत्र-त्रयाय वौषट् ॥ ५ ॥… Read More


श्रीमद् भागवत की पूजनविधि तथा विनियोग, न्यास एवं ध्यान प्रार्थना वन्दे श्रीकृष्णदेवं मुरनरकभिदं वेदवेदान्तवेद्यं लोके भक्तिप्रसिद्धं यदुकुलजलधौ प्रादुरासीदपारे । यस्यासीद् रूपमेवं त्रिभुवनतरणे भक्तिवच्च स्वतन्त्रं शास्त्रं रूपं च लोके प्रकटयति मुदा यः स नो भूतिहेतुः ॥ जो इस जगत् में भक्ति से ही प्राप्त होते हैं, जिनका तत्त्व वेद और वेदान्त के द्वारा ही जाननेयोग्य है,… Read More


श्रीमद् भागवत की पूजनविधि तथा विनियोग, न्यास एवं ध्यान प्रातःकाल स्नान के पश्चात् अपना नित्य-नियम समाप्त करके पहले भगवत्-सम्बन्धी स्तोत्रों एवं पदों के द्वारा मंगलाचरण और वन्दना करे । इसके बाद आचमन और प्राणायाम करके — ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैङ्गैस्तुष्टु वा ँ्सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ १ ॥ — इत्यादि मन्त्रों… Read More


श्रीशुकदेवजी को नमस्कार यं प्रव्रजन्तमनुपतमपेतकृत्यं द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव । पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदुस्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि ॥ (१ । २ । २) जिस समय श्रीशुकदेवजी का यज्ञोपवीत संस्कार भी नहीं हुआ था, सुतरां लौकिक-वैदिक कर्मों के अनुष्ठान का अवसर भी नहीं आया था, उन्हें अकेले ही संन्यास लेने के उद्देश्य से जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरह… Read More


॥ श्रीमद्भागवत-माहात्म्य ॥ (स्वयं श्रीभगवान् के श्रीमुख से ब्रह्माजी के प्रति कथित) श्रीमद् भागवतं नाम पुराणं लोकविश्रुतम् । शृणुयाच्छ्रद्धया युक्तो मम सन्तोषकारणम् ॥ १ ॥ लोकविख्यात श्रीमद्भागवत नामक पुराण का प्रतिदिन श्रद्धा-युक्त होकर श्रवण करना चाहिये । यही मेरे संतोष का कारण है । नित्यं भागवतं यस्तु पुराणं पठते नरः । प्रत्यक्षरं भवेत्तस्य कपिलादानजं फलम्… Read More


भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय २०८ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (उत्तरपर्व) अध्याय २०८ अनुक्रमणिका-कथन (वृत्तान्त) इस पर्व के प्रारम्भ में महाराज युधिष्ठिर के पास महर्षि वेदव्यास के साथ अनेक ऋषियों के आगमन, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, नारद को वैष्णवीमाया का दर्शन, संसार के दोषों का वर्णन, पापों के भेद, शुभ… Read More


भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय २०७ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (उत्तरपर्व) अध्याय २०७ श्रीकृष्ण का द्वारका-गमन-वर्णन श्रीकृष्ण बोले — राजन् ! मैंने व्रत तथा दान द्वारा तुम्हें धर्मों का वर्णन सुनाया है, क्योंकि यही धर्म के मूल कारण हैं । अतः तुम निरन्तर अपनी धार्मिक भावना दृढ़ करो ।… Read More